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शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

बालगीत "साधारण जीवन अपनाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जननी-जन्मभूमि को अपनी,
बच्चों कभी नहीं बिसराना।
ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा,
साधारण जीवन अपनाना।।
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रोज नियम से आप सींचना,
अपनी बगिया की फुलवारी।
मत-मजहब के गुलदस्ते सी,
वसुन्धरा है प्यारी-प्यारी।
अपनी इस पावन धरती पर,
वैमनस्य को मत उपजाना।
 ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा,
साधारण जीवन अपनाना।।
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सुख-दुख का सबके जीवन में,
चक्र सदा है चलता रहता।
वो महान जो दोनों को,
सहजभाव से है हँसकर सहता।
विपदाओं के कठिन काल में,
कभी न तुम है घबराना।
 ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा,
साधारण जीवन अपनाना।।
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पथ में कंकड़-पत्थर बिखरे,
काँटे उगे हुए गुलशन में।
पथ पर आगे बढ़ते जाना,
आशाओं रखकर मन में।
सत्य-अहिंसा हर हालत में,
हमको है हथियार बनाना।
ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा,
साधारण जीवन अपनाना।।
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भारत के हैं भाग्य विधाता,
होनहार सब होते बच्चे।
छल-फरेब को नहीं जानते,
बालक होते मन के सच्चे।
प्यार बाँटना सारे जग में,
सबको अपने गले लगाना।
ठाठ-बाट को छोड़ हमेशा,
साधारण जीवन अपनाना।।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (१८-०७-२०२०) को 'साधारण जीवन अपनाना' (चर्चा अंक-३७६६) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह!सर ,बहुत प्रेरणादायक सृजन ।

    जवाब देंहटाएं

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