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गुरुवार, 30 जुलाई 2020

दोहे "बनकर रहो शरीफ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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भैंसे भी चलने लगे, अब तो टेढ़ी चाल।
गैंडों से भी हो गई, मोटी इनकी खाल।।
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रोप रहे हैं चमन में, शातिर विष की बेल।
धर्म-जाति की आड़ में, खेल रहे हैं खेल।।
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गाँधी, भीम-पटेल की, थोथी जय-जयकार।
बेटा-बाप कुटुम्भ की, दल-दल में भरमार।।
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पण्डित-मुल्ला पन्थ की, चला रहे दूकान।
माथा अपना ठोंकते, राम और रहमान।।
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लोकतन्त्र से है बँधा, जन-जन का अनुबन्ध।
राजतन्त्र की क्यों यहाँ, फैलाते दुर्गन्ध।।
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देशभक्ति के रंग में, बनकर रहो शरीफ।
पाक-चीन की छोड़ दो, करना अब तारीफ।।
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खाते हो जिस देश का, उससे करो न घात।
नहीं करो विष वमन को, करो नेह की बात।।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार( 31-07-2020) को "जन-जन का अनुबन्ध" (चर्चा अंक-3779) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह , तेज और धारदार , पहले जैसा !!
    प्रणाम भाई जी !

    जवाब देंहटाएं
  3. सुन्दर और सराहनीय बेहतरीन प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  4. लोकतन्त्र से है बँधा, जन-जन का अनुबन्ध।
    राजतन्त्र की क्यों यहाँ, फैलाते दुर्गन्ध।।
    वाह!!!
    कँया बात ...सटीक ....

    जवाब देंहटाएं

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