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शनिवार, 28 नवंबर 2020

दोहे "खास हो रहे मस्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

एकल कवितापाठ का, अपना ही आनन्द।
रोज़ गोष्ठी को करो, करके कमरा बन्द।।
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कोरोना के काल में, मजे लूटता खास।
मँहगाई की मार से, होता आम उदास।।
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कम शब्दों के मेल से,  दोहा बनता खास।
सरस्वती जी का अगर, रहे हृदय में वास।।
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फिर से पैदा हो गये, बाबर-औरंगजेब।
इनमें उनकी ही तरह, भरे हुए हैं ऐब।।
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सम्बन्धों की आड़ में, वासनाओं का खेल।
झूठी कर तारीफ को, करते तन का मेल।।
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आम आदमी पिस रहा, खास हो रहे मस्त।
खोटे सिक्कों ने करी, न्याय व्यवस्था ध्वस्त।।
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सामाजिक परिवेश में, जब से आयी मोच।
तब से लोगों की हुई, कितनी गन्दी सोच।।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. आम आदमी पिस रहा, खास हो रहे मस्त।
    खोटे सिक्कों ने करी, न्याय व्यवस्था ध्वस्त।।
    --
    सामाजिक परिवेश में, जब से आयी मोच।
    तब से लोगों की हुई, कितनी गन्दी सोच।।

    यथार्थ का खरा- खरा चित्रण
    साधुवाद आदरणीय 🙏
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

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