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शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

बालगीत "सीधा प्राणी गधा कहाता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से

एक बालगीत

कितना सारा भार उठाता।
लेकिन फिर भी गधा कहाता।।


रोज लाद कर अपने ऊपर,
कपड़ों के गट्ठर ले जाता।
वजन लादने वाले को भी,
तरस नही इस पर है आता।।


जिनसे घर में चूल्हा जलता,
उन लकड़ी-कण्डों को लाता।
जिनसे पक्के भवन बने हैं,
यह उन ईंटों को पहुँचाता।।
 
यह सीधा-सादा प्राणी है,
घूटा और घास को खाता।
जब ढेंचू-ढेंचू करता है,
तब मालिक है मार लगाता।।
 
सीधा प्राणी गधा कहाता,
सिर्फ काम से इसका नाता।
भूखा-प्यासा चलता जाता।
फिर भी नही किसी को भाता।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. सीधा प्राणी गधा कहाता,
    सिर्फ काम से इसका नाता।
    भूखा-प्यासा चलता जाता।
    फिर भी नही किसी को भाता।।
    बहुत सटिक।

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२१-११-२०२०) को 'प्रारब्ध और पुरुषार्थ'(चर्चा अंक- ३८९८) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  3. सीधा प्राणी गधा कहाता,
    कभी-कभी मतदाता बनता,
    कभी किसी की सीढ़ी बनता
    ख़ुद को निस-दिन ख़ूब ठगाता.

    जवाब देंहटाएं
  4. नमस्कार शास्त्री जी, इस कव‍िता ने तो बचपन याद द‍िला द‍िया...बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं
  5. रोज लाद कर अपने ऊपर,
    कपड़ों के गट्ठर ले जाता।
    वजन लादने वाले को भी,
    तरस नही इस पर है आता।।
    वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर सटीक एवं सार्थक।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर बाल कविता , सार्थक मोहक।

    जवाब देंहटाएं

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