ढंग निराले होते जग में, मिले जुले परिवार के। देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।। -- चमन एक हो किन्तु वहाँ पर, रंग-विरंगे फूल खिलें, मधु से मिश्रित वाणी बोलें, इक दूजे से लोग मिलें, ग्रीष्म-शीत-बरसात सुनाये, नगमे सुखद बहार के। देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।। -- पंचम सुर में गाये कोयल, कलिका खुश होकर चहके, नाती-पोतों की खुशबू से, घर की फुलवारी महके, माटी के कण-कण में गूँजें, अभिनव राग सितार के। देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।। -- नग से भू तक, कलकल करती, सरिताएँ बहती जायें, शस्यश्यामला अपनी धरती, अन्न हमेशा उपजायें, मिल-जुलकर सब पर्व मनायें, थाल सजें उपहार के। देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।। -- गुरूकुल हों विद्या के आलय, बिके न ज्ञान दुकानों में, नहीं कैद हों बदन हमारे, भड़कीले परिधानों में, चाटुकार-मक्कार बनें ना, जनसेवक सरकार के। देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।। -- बरसें बादल-हरियाली हो, बुझे धरा की प्यास यहाँ, चरागाह में गैया-भैंसें, चरें पेटभर घास जहाँ, झूम-झूमकर सावन लाये, झोंके मस्त बयार के। देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के।। -- |
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नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार 30 मई 2022 को 'देते हैं आनन्द अनोखा, रिश्ते-नाते प्यार के' चर्चा अंक 4446 पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।
चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
#रवीन्द्र_सिंह_यादव
बेहतरीन सृजन
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