| Oh Never More : Percy Bysshe Shelley अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" |
| ओ संसार! ओ जीवन! ओ समय! जो भी तुम्हारी अन्तिम सीढ़ी पर चढ़ा वो कँपकपाया जो पहले से ही यहाँ पर विद्यमान था जब वह लौटेगा अपनी सर्वोच्च महिमा पर तब कुछ नही बचेगा कभी नहीं कुछ बचेगा रात और दिन गुजरते जायेंगे खुशियाँ उड़ जायेंगी ताजा बसन्त, गर्मियाँ और सर्दियाँ मेरे दुखी दिल को खुशी से छोड़ जायेंगी और कुछ नही बचेगा कभी भी कुछ नही बचेगा! |
Percy Bysshe Shelley 1792–1822 |
जन्म : 1878 