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गुरुवार, 6 मई 2010

“परिजन : CARL STANDBURG” (अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

KIN A POEM: Carl Sandburg 
अनुवादक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”
सागरतल की गहराई में
ज्वाला बनकर धधक रही हूँ,
हुए हजारों साल, आज भी
मैं वैसे ही भभक रही हूँ,

मत छूना मुझको ऐ भाई!
अपना धर्म नहीं छोड़ूँगी,
मेरा नाम आग है भाई!
मैं नही शीतलता ओढ़ूँगी, 

मुझे परिधि में सीमित रखकर,
कैद कभी नही कर पाओगे,
कितने ही प्रयत्न करो, पर
गोदी में नही भर पाओगे,

अगर बदलना चाहो तो, तुम
खुद को बदलो ऐ भाई!
मेरा करो प्रयोग-भोग पर,
मैं नही बदलूँगी भाई!
CARL STANDBURG
जन्म : 1878
मृत्यु : 1967

11 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लगा अनुवाद पढ़कर.

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  2. गज़ब्………।शानदार्………॥बेहतरीन अनुवाद्।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया चलिए आपके बहाने से ही सही हमे भी इनको पढने का मौका तो मिला !!
    आभारी हूँ आपका !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर रचना का सुन्दर अनुवाद

    उत्तर देंहटाएं
  5. अनुवाद बहुत ही अच्छा लगा. धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्दर अनुवाद किया है आपने ! शानदार प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  7. लयात्मक अनुवाद का सुंदरतम् प्रयास!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत खूबसूरत कविता और उतना ही अच्छा अनुवाद ...बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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