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बुधवार, 5 मई 2010

"बैठे-ठाले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जो तुक्केबाज होते है,
वही शायर कहाते हैं!
उड़ाते दूसरों की जो,
वही तो दाद पाते हैं!

बहुत हैं शख्शियत ऐसी,
जो औरों से लिखाते हैं!
उन्ही की शायरी पढ़कर,
गधे भी खिलखिलाते हैं!

कई ऐसे भी होते हैं,
जो कॉपी पेन लाते हैं,
मजे की बात तो ये है,
वो लिखते से लजाते हैं!

मगर हम हैं बहुत भूखे,
ग़ज़ल खाकर पचाते है!
बहुत होंगे मेरे जैसे,
जो दुनिया को सताते हैं!

17 टिप्‍पणियां:

  1. क्यों शायरों का दिल दुखाते हैं , शास्त्री जी ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या कहने...........

    बहुत खूब...........बिलकुल आपकी तरह आपकी रचना...........

    उत्तर देंहटाएं
  3. आह मुझे आज के फ़िल्मी गीताकारों की याद आई

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज कि इस पोस्ट में मज़ा आ गया...

    उत्तर देंहटाएं
  5. यह भी खूब रही
    आपने भी खूब कही

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत हैं शख्शियत ऐसी,
    जो दूजों से लिखाते हैं!
    उन्ही की शायरी पढ़कर,
    गधे भी खिलखिलाते हैं!
    ...bahut badhiya.

    उत्तर देंहटाएं
  7. "बहुत होंगे मेरे जैसे,
    जो दुनिया को सताते हैं!"



    युही सताते रहिये - हम भी सदा सताए हुए ही बने रहना चाहते है !!

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह वाह क्या बात है! बहुत खूब लिखा है आपने!

    उत्तर देंहटाएं
  9. शास्त्रीजी,
    इधर कई दिनों से आना नहीं हुआ; अत्यधिक व्यस्तता रही ! माफ़ी चाहता हूँ !
    खूब भिंगा-भिंगा के शब्द रखे हैं और गज़लें खाकर पचाने वाली बात पे तो मज़ा आ गया !
    सादर--आ.

    उत्तर देंहटाएं
  10. क्या गज़ब लिखा है....कहीं कुछ सत्य भी है ...

    http://athaah.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  11. aap itna accha kaise likh lete hain...
    sach mein ...
    bahut sundar..

    उत्तर देंहटाएं
  12. arey aap kahaan sataa rhey hain....aap toh duniya ko sahi raah dikhaa rahey hain...

    उत्तर देंहटाएं
  13. waah waah ..........mazaa aa gaya padhkar.kya khoob lapeta hai .

    उत्तर देंहटाएं

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