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वासन्ती परिधान ओढ़कर,
सूरज ने भी रंग दिखाया।
मुझको यह आभास होगया-
अब बसन्त का मौसम आया।।
पहिन बसन्ती-पीली
साड़ी,
फूली सरसों मनभावन
है।
गीत और संगीत बसन्ती,
मौसम लोक-लुभावन सा
है।
गेहूँ लहर-लहर
बलखाते,
भँवरा फूलों पर
मँडराया।
मुझको यह आभास हो
गया-
अब बसन्त का मौसम
आया।।
आम,
नीम भी बौराए है,
तरुवर नव पल्लव पाये है।
पीपल,गूलर भी हर्षित हैं,
भँवरे गुल पर आकर्षित हैं।
सेमल में भी फूल खिले हैं,
जंगल में पलाश मुस्काया।
मुझको यह आभास होगया-
अब बसन्त का मौसम आया।।
नील-गगन से छँटा कुहासा,
कोयल मीठे स्वर में गातीं,
हिमगिरि साफ दिखाई देते,
नदिया कल-कल नाद सुनातीं।
हीटर,
गीजर बन्द हो गए ,
सरदी ने भी कोप घटाया।
मुझको यह आभास होगया-
अब बसन्त का मौसम आया।।
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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013
"वासन्ती परिधान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 6 फ़रवरी 2013
"पढ़ लेते हैं सारी भाषा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() आशा और निराशा की जो,
पढ़ लेते हैं सारी भाषा।
दो नयनों में ही होती हैं,
सारी दुनिया की परिभाषा।।
दुख के बादल आते ही ये,
खारे जल को हैं बरसाते।
सुख का जब अनुभव होता है,
तब ये फूले नहीं समाते।
सरल बहुत हैं-चंचल भी हैं,
इनके भीतर भरी पिपासा।
दो नयनों में ही होती हैं,
सारी दुनिया की परिभाषा।।
कुछ में होती है खुद्दारी,
कुछ में होती है मक्कारी।
कुछ ऐसी भी आँखें होती,
जिनमें होती है गद्दारी।
ऐसी बे-ग़ैरत आँखों से,
मन में होती बहुत हताशा।
दो नयनों में ही होती हैं,
सारी दुनिया की परिभाषा।।
दुनिया भर की सरिताओं का,
इसमें आकर पानी ठहरा।
लहर-लहरकर लहरें उठतीं,
ये भावों का सागर गहरा।
बिन आँखों के जग सूना है,
ये जीवन की हैं अभिलाषा।
दो नयनों में ही होती हैं,
सारी दुनिया की परिभाषा।।
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मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013
"लगता है बसन्त आया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
हर्षित होकर राग भ्रमर ने गाया है!
लगता है बसन्त आया है!!
नयनों में सज उठे सिन्दूरी सपने से,
कानों में बज उठे साज कुछ अपने से,
पुलकित होकर रोम-रोम मुस्काया है!
लगता है बसन्त आया है!!
खेतों ने परिधान बसन्ती पहना है,
आज धरा ने धारा नूतन गहना है,
आम-नीम पर बौर उमड़ आया है!
लगता है बसन्त आया है!!
पेड़ों ने सब पत्र पुराने झाड़ दिये हैं,
बैर-भाव के वस्त्र सुमन ने फाड़ दिये है,
होली की रंगोली ने मन भरमाया
है!
लगता है बसन्त आया है!!
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सोमवार, 4 फ़रवरी 2013
"विद्यालय का दिया हुआ जन्मदिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 3 फ़रवरी 2013
"दो मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
शनिवार, 2 फ़रवरी 2013
"कुहरा छाया है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
बेमौसम कुहरा छाया है।
सूरज कितना घबराया है।।
अलसाये पक्षी लगते हैं।
राह उजाले की तकते हैं।।
सूरज जब धरती पर आये।
तब हम दाना चुगने जायें।।
भुवन भास्कर हरो कुहासा।
समझो खग के मन की भाषा।।
बिल्ली सुस्ताने को आई।
लेकिन यहाँ धूप नही पाई।।
नीचे जाने की अब ठानी।
ठण्डक से है जान बचानी।।
बच्चों से वह बोली म्याऊँ।
बिस्तर में जाकर छिप जाऊँ।।
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शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013
"सुहाना लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() सबको अपना आज सुहाना लगता है।
छिपा
हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
उडने
को आकाश पड़ा है,
पुष्पक
भी तो पास खड़ा है,
पंछी
को परवाज सुहाना लगता है।
छिपा
हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
राजनीति
की सनक चढी है,
लोलुपता
की ललक बढ़ी है,
काँटों
का भी ताज सुहाना लगता है।
छिपा
हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
गेहूँ
पर आ गई बालियाँ,
हरे
रंग में रंगी डालियाँ,
ऋतुओं
में ऋतुराज सुहाना लगता है।
छिपा
हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
गुञ्जन
करना और इठलाना,
भीना-भीना
राग सुनाना,
मलयानिल
का साज सुहाना लगता है।
छिपा
हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
तन-मन
ने ली है अँगड़ाई,
कञ्चन
सी काया गदराई,
होली
का आगाज सुहाना लगता है।
छिपा
हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
टेसू
दहका अंगारा सा,
आशिक
बहका आवारा सा,
बासन्ती
अन्दाज सुहाना लगता है।
छिपा
हुआ हर राज सुहाना लगता है।।
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