मित्रों!
कल मातृदिवस था,
लेकिन नेट की समस्या के चलते
यह रचना पोस्ट नहीं हो पायी थी।
आप सबको मातृदिवस की
शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ..! ![]()
जीवन देने वाली जननी, माता तुझको नमन हमारा।
माता नहीं कुमाता होती, माँ को उसका बालक प्यारा।।
तूने उच्चारण सिखलाया, रिश्ते-नातों को बतलाया,
खुद गीले में सोयी, लेकिन सूखे में था हमें सुलाया.
गणपति की तुम पार्वती हो, तुमसे तो विधना भी हारा।
माता नहीं कुमाता होती, माँ को उसका बालक प्यारा।।
कितने ही युग बदले लेकिन, बदल न पायी माँ की ममता,
बेटा हो या चाहे बेटी हो, माँ रखती दोनों में समता,
जीवनभर बालक को देती, उसकी माता सदा सहारा।
माता नहीं कुमाता होती, माँ को उसका बालक प्यारा।।
प्रथम गुरू हो तुम बालक की, जगदम्बा की तुम हो मूरत,
रची हुई है-बसी हुई है, सबके मन में माँ की सूरत,
हमें सजाया और सँवारा, माँ ने मेरा “रूप” निखारा।
माता नहीं कुमाता होती, माँ को उसका बालक प्यारा।।
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गुरुवार, 9 मई 2013
"मातृदिवस की शुभकामनाएँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 8 मई 2013
रविवार, 5 मई 2013
‘‘मेरी पतंग बड़ी मतवाली’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
![]()
लाल और काले रंग
वाली,
मेरी पतंग बड़ी
मतवाली।
मैं जब विद्यालय से
आता,
खाना खा झट छत पर
जाता।
![]()
पतंग उड़ाना मुझको
भाता,
बड़े चाव से पेंच
लड़ाता।
पापा-मम्मी मुझे
रोकते,
बात-बात पर मुझे
टोकते।
लेकिन मैं था नहीं
मानता,
नभ में अपनी पतंग
तानता।
वही हुआ मन में जो
डर था,
अब मैं काँप रहा
थर-थर था।
मैं था यारों ऐसा
हीरो,
सब विषयों लाया
जीरो।
अब ये मैंने सोच
लिया है,
पतंग उड़ाना छोड़
दिया है।
कभी नहीं अब हूँगा फेल,
नहीं करूँगा ज्यादा
खेल।
आसमान में उड़ने
वाली,
जो करती थी सैर
निराली।
मैंने उसे फाड़ डाला
है,
छत पर लगा दिया
ताला है।
मित्रों! मेरी बात
मान लो,
अपने मन में आज ठान
लो।
पुस्तक लेकर ज्ञान
बढ़ाओ।
कभी-कभी ही पतंग
उड़ाओ।।
|
शनिवार, 4 मई 2013
"आ गये नेता नंगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
![]() लोकतन्त्र में हो रहा, गन्दा कारोबार।
शोक
सभा में कर रहे, वोटों का व्यापार।।
कराने
झगड़े-दंगे।
आ
गये नेता नंगे।।
जीते-जी
ना कर सके, सहायता का काम।
मर
जाने के बाद में, देते हैं ईनाम।।
पहन
कर चिट्टी वर्दी।
जताते
हैं हमदर्दी।।
जोड़-तोड़
के खेल से, चला रहे सरकार।
महँगाई
के सामने, बिल्कुल हैं लाचार।।
बढ़ाकर
रिश्वतखोरी।
भर
रहे खूब तिजोरी।।
पाक-चीन
ललकारते, रहे धरा को छीन।
फिर
भी नेता जा रहे, दावत खाने चीन।।
बने
माता के घाती।
शर्म
नहीं इनको आती।।
|
शुक्रवार, 3 मई 2013
"राम नाम ........है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
गुरुवार, 2 मई 2013
"दर्द दिल में जगा दिया उसने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
आज फिर से दग़ा किया उसने
दर्द दिल में जगा
दिया उसने
फिर से इन्सानियत
के चेहरे पे
दाग़ काला लगा
दिया उसने
राहे-हक़ के हसीन ग़ुलशन में
नया काँटा उगा
दिया उसने
पीठ पर वार करके
भाले से
शेर सोता जगा दिया
उसने
भाईचारे की शाख
टूट गयी
दोस्ती को भगा
दिया उसने
आज फिर ज़ुल्म की इबारत
में
नाम अपना लिखा
दिया उसने
तोड़ कर सब
रवायतें-रस्में
“रूप” असली दिखा
दिया उसने
|
बुधवार, 1 मई 2013
"वो मजे से दूर हैं-मजदूर दिवस पर..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
![]() वो मजे में चूर हैं, बस इसलिए मग़रूर हैं
हम मजे से दूर हैं, बस इसलिए मजदूर हैं
आज भी बच्चे हमारे, बीनते कचरा यहाँ,
किन्तु उनके लाल, मस्ती के लिए मशहूर हैं
कोठियों को बनाकर, हम सो रहे फुटपाथ पर
उन निठल्लों के लिए तो, कोठियाँ भरपूर हैं
हम पसीने को बहाकर, सींचते जाते चमन
जो गुलों को नोचते, वो हो गये पुरनूर हैं
नक्कारखाने में फँसी, तूती बिचारी क्या करे
अंजुमन में लोग तो अपने नशे में चूर हैं
लोकशाही का यहाँ, कितना घिनौना “रूप” है
श्रमिकों के ख्वाब सारे आज चकनाचूर हैं
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