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शुक्रवार, 3 मई 2013

"राम नाम ........है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

        आज अधिकतर लोग भारत को कुतरने में करने में लगे हैं। जिसे भी देखता हूँ वही इसका कुछ न कुछ नोच ही लेता है और अपनी कर्तव्य परायणता पूरी कर लेता है। इसीलिए मेरा प्यारा देश! उपहास का पात्र बनता जा रहा है।
       इस कड़ी को मैं एक कथानक के माध्यम से स्पष्ट कर रहा हूँ। जो बचपन में मेरे ताऊ जी मुझे सुनाया करते थे।
      प्राईमरी स्कूल के एक मास्टर साहब थे। वे स्कूल परिसर में ही एक टीन शेड में रहते थे। लेकिन दो दिन बाद स्कूल में डिप्टी साहब का दौरा होने वाला था। इसलिए मास्टर साहब ने तुरत-फुरत बाजार जाकर कुरते-पाजामे का कपड़ा लिया और दर्जी को सिलने के लिए दे आये। अगले दिन दर्जी ने उनका कुरता पाजामा सिल कर उनके घर पहुँचा दिया।
मास्टर साहब ने दर्जी के जाने के बाद इसे पहिन कर देखा तो कुर्ता तो ठीक था परन्तु पाजामा कुछ दो इंच लम्बा हो गया था।
      मास्टर साहब ने अपनी पत्नी से कहा- ‘‘भागवान! कल स्कूल में डिप्टी साहब का मुआयना है। मेरा पाजामा 2 इंच काट कर फिर से तुरपाई कर दो।’’
       मास्टर साहब की पत्नी ने कहा- ‘‘सुनो जी मेरी फुरसत नही है। बेकार के काम मुझे मत बताया करो।’’
       अब मास्टर साहब अपनी बड़ी पुत्री के पास गये और उससे कहा- ‘‘बिटिया रानी! मेरा पाजामा दर्जी ने दो इंच बड़ा सिल दिया है। इसे दो-इंच काट कर तुरपाई कर दो।’’
       बड़ी बेटी ने कहा- ‘‘पिता जी! मेरे कल से इम्तिहान होने वाले हैं। आप इसे दर्जी से ही ठीक करा लो।’’
        कुछ इसी तरह का बहाना छोटी बेटी ने भी बना दिया।
        अब मास्टर जी ने सोचा कि मैं ही इसे 2 इंच काट कर छोटा कर लेता हूँ और उन्होंने पाजामा ठीक करके खूँटी पर टाँग दिया।
--
          इधर मास्टरनी जी को भी ख्याल आया तो उन्होंने भी पाजामामे पर कैंची चला कर ठीक करके फिर से उसी खूँटी पर टाँग दिया।
         यही करामात दोनों बेटियों ने भी कर दी और पाजामे को ज्यों का त्यों खूँटी पर टाँग दिया।
        अगले दिन जैसे ही डिप्टी साहब के स्कूल में आने की हल-चल हुई तो मास्टर साहब ने जल्दी से कुरता पाजामा पहना और बन-ठन कर कक्षा में आ गये।
        छात्र-छात्राएँ मास्टर साहब को देख कर हँसने लगे तो मास्टर जी ने कहा-‘‘देखते नही, डिप्टी साहब मुआयने के लिए आये हैं और आप लोग हँस रहे हैं।"
       डिप्टी साहब ने भी मास्टर जी की ओर ध्यान दिया तो वह भी हँसते हुए बोले- ‘‘मास्टर जी! पहले अपने को तो देखो। आपने यह जो पहन रखा है, ना तो यह पाजामा है और नही घुटन्ना है।’’
        कहने का तात्पर्य यह है कि मेरे देश की भी दशा मास्टर जी के पाजामे से कम नही है।
        आज देश के कर्णधार ही इसे सबसे ज्यादा कुतरने में लगे हैं।
सच्ची बात है भैया! राम नाम ....................है।

16 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहा आपने ,बेहद चिंता जनक स्थिति है

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  2. कल के चर्चा मंच पर आपकी प्रविष्टि शामिल है। सूचनार्थ ।

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  3. आजकल चारों तरफ़ इसी पायजामे वाला हाल है, बहुत सटीक.

    रामराम.

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  4. एकदम सही उदाहरण है। काम करने वाले काम कर रहे हैं, बल्कि एक की जगह तीन-तीन कारीगर लगे हुए हैं परंतु सही नेतृत्व, प्रबंधन, और निर्देशन की भारी कमी है।

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  5. चिंता जनक स्थिति है..क्या कर सकते हैं...आभार

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  6. आज के हालात पर बेहतरीन उदाहरण,आपका आभार आदरणीय.

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  7. आपने सभी कहा चिन्ता का विषय है..... बहुत सुंदर प्रस्तुति!!

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  8. जैसे अक्ल पर ही पत्थर पड़ गये हों!

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  9. वर्तमान का सच तो यही है
    आपने सटीक और सार्थक लिखा है
    सहजता से गहरे अर्थों के साथ
    बहुत सुंदर
    बधाई


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  10. बहुत बढ़ि‍या उदाहरण दि‍या है आपने..बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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