कलियाँ मसल रहे हैं डाकू, वीराना सा हुआ चमन। सौरभ सुमन कहाँ से आयें, उजड़ा है प्यारा उपवन।। सोने की चिड़िया के कुन्दन पंख सलोने नोच लिए, रत्न-जड़ित सिंहासन, धोखा देकर स्वयं दबोच लिए, घर लगता सूना-सूना सा, मरुथल सा लगता आँगन। सौरभ सुमन कहाँ से आयें, उजड़ा है प्यारा उपवन।। गोली - बारूदों को, भोली - भाली बस्ती झेल रही, अवश-विवश से मौत अनर्गल पल-पल होली खेल रही, पूजन-वन्दन है पिंजड़े में, घूम रहा आजाद दमन। सौरभ सुमन कहाँ से आयें, उजड़ा है प्यारा उपवन।। केसर की क्यारी को कैसे, मिल पायेगा छुटकारा, छल-बल के ताने-बाने का, कौन करेगा निबटारा, गिद्ध-दृष्टि से कैसे बच पायेगा मेरा सरल सुमन। सौरभ सुमन कहाँ से आयें, उजड़ा है प्यारा उपवन।। |
|---|
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
Linkbar
फ़ॉलोअर
बुधवार, 4 नवंबर 2009
"उजड़ा है प्यारा उपवन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मंगलवार, 3 नवंबर 2009
"आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
पत्थरों के देश में हर आइना कमजोर है। आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।। है हवाओं में जहर, हर ओर बरपा है कहर, लूट, हत्याओं का आलम छा रहा सब ओर है। आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।स्नेह बिन कैसे जलेगा, भाईचारे का दिया, नफरतों ने काट दी,सम्बन्ध की अब डोर है। आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।। घोंसलों की हो हिफाजत अब यहाँ कैसे भला, पेड़ की हर शाख पर, बैठा हुआ जब चोर है। आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।। दूध की रक्षा गई है, बिल्लियों के हाथ में, अंजुमन में हो रहा, अब वानरों का शोर है। आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।। |
|---|
रविवार, 1 नवंबर 2009
"पागलपन करता रहता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शनिवार, 31 अक्टूबर 2009
"दरवाजों की दस्तक को, पढ़ पाना बहुत जरूरी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
नौ माह और दस दिन में पूरी हो गयीं हैं,
आज 400 पोस्ट !
जीवन के कवि सम्मेलन में, गाना तो मजबूरी है।
जाने कितने स्वप्न संजोए,
"इन्दिरा! भूलेंगे कैसे तेरो नाम!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009
"एक मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
ये आँखे कुछ बोल रही हैं?
बुधवार, 28 अक्टूबर 2009
"प्रीत की होती सजा कुछ और है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
अन्धे कुएँ में पैंठकर, ऐसे न तुम ऐंठा करो, झील-तालाबों की दुनिया और है। बन्द कमरों में न तुम, हर-वक्त यूँ बैठा करो, बाग की ताजा फिजाँ कुछ और है। स्वर्ण-पिंजड़े में कभी शुक को सुकूँ मिलता नही, सैर करने का मज़ा कुछ और है। जुल्म से और जोर से अपना नहीं बनता कोई प्यार करने की रज़ा कुछ और है। गाँव में रहकर रिवाजों-रस्म को मत तोड़ना, प्रीत की होती सज़ा कुछ और है। (चित्र गूगल सर्च से साभार) |
|---|
लोकप्रिय पोस्ट
-
लगभग 24 वर्ष पूर्व मैंने एक स्वागत गीत लिखा था। इसकी लोक-प्रियता का आभास मुझे तब हुआ, जब खटीमा ही नही इसके समीपवर्ती क्षेत्र के विद्यालयों म...
-
दोहा और रोला और कुण्डलिया दोहा दोहा , मात्रिक अर्द्धसम छन्द है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) मे...
-
नये साल की नयी सुबह में, कोयल आयी है घर में। कुहू-कुहू गाने वालों के, चीत्कार पसरा सुर में।। निर्लज-हठी, कुटिल-कौओं ने,...
-
समास दो अथवा दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए नए सार्थक शब्द को कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि ...
-
आज मेरे छोटे से शहर में एक बड़े नेता जी पधार रहे हैं। उनके चमचे जोर-शोर से प्रचार करने में जुटे हैं। रिक्शों व जीपों में लाउडस्पीकरों से उद्घ...
-
इन्साफ की डगर पर , नेता नही चलेंगे। होगा जहाँ मुनाफा , उस ओर जा मिलेंगे।। दिल में घुसा हुआ है , दल-दल दलों का जमघट। ...
-
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल। श्वेत -श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन ...
-
"चौपाई लिखिए" बहुत समय से चौपाई के विषय में कुछ लिखने की सोच रहा था! आज प्रस्तुत है मेरा यह छोटा सा आलेख। यहाँ ...
-
मित्रों! आइए प्रत्यय और उपसर्ग के बारे में कुछ जानें। प्रत्यय= प्रति (साथ में पर बाद में)+ अय (चलनेवाला) शब्द का अर्थ है , पीछे चलन...
-
“ हिन्दी में रेफ लगाने की विधि ” अक्सर देखा जाता है कि अधिकांश व्यक्ति आधा "र" का प्रयोग करने में बहुत त्र...


