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मंगलवार, 3 नवंबर 2009

"आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")






पत्थरों के देश में हर आइना कमजोर है।
आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।


है हवाओं में जहर, हर ओर बरपा है कहर,
लूट, हत्याओं का आलम छा रहा सब ओर है।
आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।


स्नेह बिन कैसे जलेगा, भाईचारे का दिया,
नफरतों ने काट दी,सम्बन्ध की अब डोर है।
आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।


घोंसलों की हो हिफाजत अब यहाँ कैसे भला,
पेड़ की हर शाख पर, बैठा हुआ जब चोर है।
आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।


दूध की रक्षा गई है, बिल्लियों के हाथ में,
अंजुमन में हो रहा, अब वानरों का शोर है।
आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. पत्थरों के देश में हर आइना कमजोर है।
    आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।

    बहुत खुब कहा आप ने ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. गज़ब की कविता...........

    वाह !

    दर्पण दिखा दिया..............

    आपको विनम्र नमन !

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज की एक ज्वलंत सच्चाई उजागर करती कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  4. पत्थरों के देश में हर आइना कमजोर है।
    आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।
    waah! bahut hi sateek aur saarthak kavita .......

    उत्तर देंहटाएं
  5. वेश कोई भी हो पर
    आदमी को होश नहीं है।


    होश है तो सिर्फ अपने
    स्‍वार्थों को पूरा करने का।


    लालच को समेटने का
    खुद घर भरने का इसलिए

    इंसान इंसान नहीं आदमखोर सान है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुव्दर कविता।
    मेरी इच्छा है कि इस भाव-भरी कविता को
    विश्व का हर व्यक्ति पढ़कर शिक्षा ग्रहण करे।

    उत्तर देंहटाएं
  7. कोरा सत्य बयान किया है अपने सुन्दर शब्दों में पिरोकर !!

    उत्तर देंहटाएं
  8. आदमी के वेश में हम सब ब्‍लोगखोर हैं। जनसंख्‍या तो काफी बढ़ रही है? अच्‍छी रचना, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. पत्थरों के देश में हर आइना कमजोर है।
    आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।

    waah.........bahut hi sundar panktiyan aur utni hi sundar baat kahi hai.

    उत्तर देंहटाएं
  10. आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है ।
    यूं तो हर शब्‍द बहुत ही गहराई लिये, हर पंक्ति भावपूर्ण, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. आत्मा जागने वाली पोस्ट है आपकी। शायद कोई आत्म जाग पड़े। आज नहीं तो कल कोई आपकी इस पोस्ट का जिक्र तो जरूर करेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह क्या बात है। हर लफ़्ज कुछ कहता है।

    उत्तर देंहटाएं
  13. पत्थरों के देश में हर आइना कमजोर है।
    आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।

    बहुत सुन्दर भाव शास्त्री जी ...अत्यंत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  14. पत्थरों के देश में हर आइना कमजोर है।
    आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है।।
    बहुत खूब यथार्थ चित्रण, वाकई इंसान आदमखोर हो गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  15. सही कहा.. सभी आदमखोर है.. मौका मिलना चाहिये..

    उत्तर देंहटाएं
  16. Aaaj to Sach main aadmee hee adamkhoor ho gaya...

    katu kintu saty hai !!

    उत्तर देंहटाएं
  17. अद्भुत और गज़ब की कविता लिखा है आपने जिसमें सच्चाई को बखूबी प्रस्तुत किया है!

    उत्तर देंहटाएं

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