| नेताओं का बदल गया है, धर्म और ईमान, जितने बड़े करें घोटाले, उतने बनें महान, सारा जग करता गुणगान, ये है मेरा हिन्दुस्तान। भूखी-नंगी जनता को, भाषण से ही भरमाता, प्रश्न उठाने को संसद में, भारी नोट कमाता, कोठी, बंगला, कार विदेशी, पाल रहा ये श्वान, सारा जग करता गुणगान, ये है मेरा हिन्दुस्तान। अमर शहीदों के ताबूतों में, खाता रिश्वतखोरी, चारे के बदले में भरता जाता, बड़ी तिजोरी, ये है दल-बदलू इन्सान, सारा जग करता गुणगान, ये है मेरा हिन्दुस्तान। गांधी, गौतम अगल-बगल रख,दारू खूब उड़ाता, आदर्शों की बलिवेदी पर, रिश्वत सुमन चढ़ाता, बन बैठा पूरा शैतान, सारा जग करता गुणगान, ये है मेरा हिन्दुस्तान। तन भी काला, मन भी काला, काली सब करतूतें, ऐसे नेताओं को मारो,बिना गिने ही जूते, करना मत इनका सम्मान, मत करना इनका गुणगान, ये है मेरा हिन्दुस्तान। |
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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बुधवार, 12 मई 2010
"मेरा हिन्दुस्तान!" (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मंगलवार, 11 मई 2010
हो गया क्यों देश ऐसा ? (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
| कल्पनाएँ डर गयी हैं, भावनाएँ मर गयीं हैं, देख कर परिवेश ऐसा। हो गया क्यों देश ऐसा?? पक्षियों का चह-चहाना , लग रहा चीत्कार सा है। षट्पदों का गीत गाना , आज हा-हा कार सा है। गीत उर में रो रहे हैं, शब्द सारे सो रहे हैं, देख कर परिवेश ऐसा। हो गया क्यों देश ऐसा?? एकता की गन्ध देता था, सुमन हर एक प्यारा, विश्व सारा एक स्वर से, गीत गाता था हमारा, कट गये सम्बन्ध प्यारे, मिट गये अनुबन्ध सारे , देख कर परिवेश ऐसा। हो गया क्यों देश ऐसा?? आज क्यों पागल, स्वदेशी हो गया है? रक्त क्यों अपना, विदेशी हो गया है? पन्थ है कितना घिनौना, हो गया इन्सान बौना, देख कर परिवेश ऐसा। हो गया क्यों देश ऐसा?? आज भी लोगों को, पावस लग रही है, चाँदनी फिर क्यों, अमावस लग रही है? शस्त्र लेकर सन्त आया, प्रीत का बस अन्त आया, देख कर परिवेश ऐसा। हो गया क्यों देश ऐसा?? |
सोमवार, 10 मई 2010
“एक पुराना मुक्तक” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
“आज नेट की चाल बहुत मद्धिम है”
इसलिए बस ये मुक्तक ही देख लीजिए!
| दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी-खाद मिला करती है। चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती है सूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता है- यौवन ढल जाने पर सबकी, गर्दन बहुत हिला करती है।। |
रविवार, 9 मई 2010
“हम उस माँ को करते प्यार!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
जिसने दिया हमें आकार! हम उस माँ को करते प्यार! पीड़ा को सहकर जिसने दुनिया में हमें उतारा, माता को अपना शिशु सबसे ज्यादा होता प्यारा, कोटि-कोटि माँ का आभार! हम उस माँ को करते प्यार!! ममता के जल से धो-धोकर जिसने हमें सँवारा, कदम-कदम पर जिस माता ने हमको दिया सहारा, जननी का हम पर उपकार! हम उस माँ को करते प्यार!! |
शनिवार, 8 मई 2010
“बचपन” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| मुझे याद जब आता है अपना बचपन। खट्टी-मीठी यादों को लाता जीवन।। गुल्ली-डण्डा और कबड्डी सारे खेल निराले, जब भी खेला करते थे हम हो-होकर मतवाले, किलकारी से गूँजा करता था आँगन। खट्टी-मीठी यादों को लाता जीवन।। बागों से कच्ची अमियों को तोड़-तोड़ लाते थे, भुने चने और नमक मिला कर हम इनको खाते थे, गाँवों में ही पाया है हमने यौवन। खट्टी-मीठी यादों को लाता जीवन।। पाटी और बुदक्का लेकर हम पढ़ने जाते थे, कान्धे पर बस्ता रखकर हम मन में हर्षाते थे, फिर से बालक बनने को करता है मन। खट्टी-मीठी यादों को लाता जीवन।। |
शुक्रवार, 7 मई 2010
"कभी कुछ नही बचेगा : Percy Bysshe Shelley " (अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
| Oh Never More : Percy Bysshe Shelley अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" |
| ओ संसार! ओ जीवन! ओ समय! जो भी तुम्हारी अन्तिम सीढ़ी पर चढ़ा वो कँपकपाया जो पहले से ही यहाँ पर विद्यमान था जब वह लौटेगा अपनी सर्वोच्च महिमा पर तब कुछ नही बचेगा कभी नहीं कुछ बचेगा रात और दिन गुजरते जायेंगे खुशियाँ उड़ जायेंगी ताजा बसन्त, गर्मियाँ और सर्दियाँ मेरे दुखी दिल को खुशी से छोड़ जायेंगी और कुछ नही बचेगा कभी भी कुछ नही बचेगा! |
Percy Bysshe Shelley 1792–1822 |
गुरुवार, 6 मई 2010
“परिजन : CARL STANDBURG” (अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| KIN A POEM: Carl Sandburg अनुवादक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक” |
सागरतल की गहराई में ज्वाला बनकर धधक रही हूँ, हुए हजारों साल, आज भी मैं वैसे ही भभक रही हूँ, मत छूना मुझको ऐ भाई! अपना धर्म नहीं छोड़ूँगी, मेरा नाम आग है भाई! मैं नही शीतलता ओढ़ूँगी, मुझे परिधि में सीमित रखकर, कैद कभी नही कर पाओगे, कितने ही प्रयत्न करो, पर गोदी में नही भर पाओगे, अगर बदलना चाहो तो, तुम खुद को बदलो ऐ भाई! मेरा करो प्रयोग-भोग पर, मैं नही बदलूँगी भाई! |
CARL STANDBURG जन्म : 1878 मृत्यु : 1967 |
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जन्म : 1878