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मंगलवार, 11 मई 2010

हो गया क्यों देश ऐसा ? (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कल्पनाएँ डर गयी हैं,
भावनाएँ मर गयीं हैं,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??

पक्षियों का चह-चहाना ,

लग रहा चीत्कार सा है।
षट्पदों का गीत गाना ,
आज हा-हा कार सा है।
गीत उर में रो रहे हैं,
शब्द सारे सो रहे हैं,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??


एकता की गन्ध देता था,
सुमन हर एक प्यारा,
विश्व सारा एक स्वर से,
गीत गाता था हमारा,
कट गये सम्बन्ध प्यारे,
मिट गये अनुबन्ध सारे ,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??


आज क्यों पागल,
स्वदेशी हो गया है?
रक्त क्यों अपना,
विदेशी हो गया है?
पन्थ है कितना घिनौना,
हो गया इन्सान बौना,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??


आज भी लोगों को,
पावस लग रही है,
चाँदनी फिर क्यों,
अमावस लग रही है?
शस्त्र लेकर सन्त आया,
प्रीत का बस अन्त आया,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??

26 टिप्‍पणियां:

  1. bahut khoob shashtri ji, " Mindless voters useless govt." thats why this is happening.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सही एवम् सटीक चित्रण..आज सब कुछ बदल रहा है..सुंदर ,भावपूर्ण कविता के लिए बधाई शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  3. बदलते वक़्त पर ....अच्छी अभिव्यक्ति .....एक अच्छी कविता ..बहुत खूब पंडित जी

    उत्तर देंहटाएं
  4. छा गए गुरु जी ....
    राम त्यागी
    http://meriawaaj-ramtyagi.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  5. हो गया क्यों देश ऐसा??


    यह सवाल तो हम सब के जहन में है !!

    उत्तर देंहटाएं
  6. ..सुंदर ,भावपूर्ण कविता के लिए बधाई शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  7. इस सब के लिए देश का हर व्यक्ति जिम्मेवार है शास्त्री जी.. बढ़िया कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर!
    घुघूती बासूती

    उत्तर देंहटाएं
  9. दीपक 'मशाल की टिपण्णी से सहमत है जी, आप ने बहुत अच्छी कविता लिखी, धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  10. सटीक चित्रण.!
    पन्थ है कितना घिनौना,
    हो गया इन्सान बौना,!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. पक्षियों का चह-चहाना ,
    लग रहा चीत्कार सा है।
    षट्पदों का गीत गाना ,
    आज हा-हा कार सा है।
    गीत उर में रो रहे हैं,
    शब्द सारे सो रहे हैं,
    देख कर परिवेश ऐसा।
    हो गया क्यों देश ऐसा??.....vah.....vah....vah.... pata nahi kis nonsense ko aapki kavita bakbas lagati hai....khair. sabko subhakaamanaaye.

    उत्तर देंहटाएं
  12. ज्ञानदत्त पांडे ने लडावो और राज करो के तहत कल बहुत ही घिनौनी हरकत की है. आप इस घिनौनी और ओछी हरकत का पुरजोर विरोध करें. हमारी पोस्ट "ज्ञानदत्त पांडे की घिनौनी और ओछी हरकत भाग - 2" पर आपके सहयोग की अपेक्षा है.

    कृपया आशीर्वाद प्रदान कर मातृभाषा हिंदी के दुश्मनों को बेनकाब करने में सहयोग करें. एक तीन लाईन के वाक्य मे तीन अंगरेजी के शब्द जबरन घुसडने वाले हिंदी द्रोही है. इस विषय पर बिगुल पर "ज्ञानदत्त और संजयदत्त" का यह आलेख अवश्य पढें.

    -ढपोरशंख

    उत्तर देंहटाएं
  13. गोदियाल जी से सहमत हूँ……………॥बहुत ही सुन्दर भावाव्यक्ति………………पीडा को दर्शाती हुई।

    उत्तर देंहटाएं
  14. पंडित जी
    कैसे हैं।
    आपकी कविता पढ़ी लेकिन यहां मैं एक टिप्पणी करना चाहता हूं।
    ज्ञानदत्त जैसे लोगों के उटपटांग ज्ञान की वजह से देश की हालात पतली है।

    उत्तर देंहटाएं
  15. और हां.. आपने चिट्ठा चर्चा में मेरी पोस्ट को शामिल किया उसके लिए आभार।
    बड़े गुस्से में रहते हैं लेकिन वे गुस्से को जल्दी ही भूल भी जाते हैं यह बात मैंने महसूस की है। स्नेह बनाए रखें।

    उत्तर देंहटाएं
  16. छा गए गुरु जी ....



    http://qsba.blogspot.com/
    http://madhavrai.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  17. शानदार और भावपूर्ण रचना! बेहद पसंद आया!

    उत्तर देंहटाएं
  18. सच को उकेरती शानदार रचना.....देश के प्रति चिता स्वाभाविक है....

    उत्तर देंहटाएं

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