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सोमवार, 10 मई 2010

“एक पुराना मुक्तक” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“आज नेट की चाल बहुत मद्धिम है” 

इसलिए बस ये मुक्तक ही देख लीजिए! 


दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, 
पानी-खाद मिला करती है।
चालू शेरों पर ही अक्सर, 
ज्यादा दाद मिला करती है
सूखे पेड़ों पर बसन्त का, 
कोई असर नही होता है-
यौवन ढल जाने पर सबकी, 
गर्दन बहुत हिला करती है।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. सही आईना दिखाता बढ़िया मुक्तक ..

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  2. बहुत बढ़िया... खाद-पानी की बात अति उत्तम है...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूब !!
    आप की तो हर रचना ही निराली है !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज हिंदी ब्लागिंग का काला दिन है। ज्ञानदत्त पांडे ने आज एक एक पोस्ट लगाई है जिसमे उन्होने राजा भोज और गंगू तेली की तुलना की है यानि लोगों को लडवाओ और नाम कमाओ.

    लगता है ज्ञानदत्त पांडे स्वयम चुक गये हैं इस तरह की ओछी और आपसी वैमनस्य बढाने वाली पोस्ट लगाते हैं. इस चार की पोस्ट की क्या तुक है? क्या खुद का जनाधार खोता जानकर यह प्रसिद्ध होने की कोशीश नही है?

    सभी जानते हैं कि ज्ञानदत्त पांडे के खुद के पास लिखने को कभी कुछ नही रहा. कभी गंगा जी की फ़ोटो तो कभी कुत्ते के पिल्लों की फ़ोटूये लगा कर ब्लागरी करते रहे. अब जब वो भी खत्म होगये तो इन हरकतों पर उतर आये.

    आप स्वयं फ़ैसला करें. आपसे निवेदन है कि ब्लाग जगत मे ऐसी कुत्सित कोशीशो का पुरजोर विरोध करें.

    जानदत्त पांडे की यह ओछी हरकत है. मैं इसका विरोध करता हूं आप भी करें.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

    उत्तर देंहटाएं

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