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बुधवार, 12 मई 2010

"मेरा हिन्दुस्तान!" (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


नेताओं का बदल गया है, धर्म और ईमान,
जितने बड़े करें घोटाले, उतने बनें महान,
सारा जग करता गुणगान,
ये है मेरा हिन्दुस्तान।


भूखी-नंगी जनता को, भाषण से ही भरमाता,
प्रश्न उठाने को संसद में, भारी नोट कमाता,
कोठी, बंगला, कार विदेशी,
पाल रहा ये श्वान,
सारा जग करता गुणगान,
ये है मेरा हिन्दुस्तान।


अमर शहीदों के ताबूतों में, खाता रिश्वतखोरी,
चारे के बदले में भरता जाता, बड़ी तिजोरी,
ये है दल-बदलू इन्सान,
सारा जग करता गुणगान,
ये है मेरा हिन्दुस्तान।


गांधी, गौतम अगल-बगल रख,दारू खूब उड़ाता,
आदर्शों की बलिवेदी पर, रिश्वत सुमन चढ़ाता,
बन बैठा पूरा शैतान,
सारा जग करता गुणगान,
ये है मेरा हिन्दुस्तान।


तन भी काला, मन भी काला, काली सब करतूतें,
  ऐसे नेताओं को मारो,बिना गिने ही जूते,
करना मत इनका सम्मान,
मत करना इनका गुणगान,
ये है मेरा हिन्दुस्तान। 

19 टिप्‍पणियां:

  1. तन भी काला, मन भी काला, काली सब करतूतें,
    बिना गिने मारो, ऐसे नेताओं को चप्पल-जूते,
    करना मत इनका सम्मान,
    मत करना इनका गुणगान,
    ये है मेरा हिन्दुस्तान।

    bilkul sahi kaha shastri ji.........hona to yahi chahiye magar log himmat nahi karte.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर और सामयिक रचना है शास्त्री है।

    व्यवस्था भ्रष्ट से भ्रष्टतम होती जा रही है। फिर भी मेरा देश महान का नारा दिया जा रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. नेताओं का बदल गया है, धर्म और ईमान,
    जितने बड़े करें घोटाले, उतने बनें महान,
    सारा जग करता गुणगान,
    ये है मेरा हिन्दुस्तान।

    kamal hai kitna bada sach likhte hain aap..
    bilkul sachi baat..
    aabhar.

    उत्तर देंहटाएं
  4. तन भी काला, मन भी काला, काली सब करतूतें,
    ऐसे नेताओं को मारो,बिना गिने ही जूते,
    करना मत इनका सम्मान,
    मत करना इनका गुणगान,
    ये है मेरा हिन्दुस्तान।

    Har desh waasee se kahungaa ki is seekh ko gambheertaa se le !

    उत्तर देंहटाएं
  5. पहला जूता वो मारे जिसने वो काम न किया हो जो नेता कर रहे हैं

    उत्तर देंहटाएं
  6. "तन भी काला, मन भी काला, काली सब करतूतें,
    ऐसे नेताओं को मारो,बिना गिने ही जूते"
    आज के नेताओं के आचरण और व्यव्हार पर करारी चोट धन्यवाद् शास्त्री जी. सुनील दत्त जी आपकी बात में बहुत दम है.

    उत्तर देंहटाएं
  7. तन भी काला, मन भी काला, काली सब करतूतें,
    ऐसे नेताओं को मारो,बिना गिने ही जूते,
    ekdam sahi!

    उत्तर देंहटाएं
  8. शास्त्री जी हमेशा की तरह...बहुत बढ़िया ... सुनील दत्त जी से असहमत... ऐसे व्यक्ति को खोजेंगे कहां से ... दूसरा फिर इस तरह का व्यक्ति मारेगा ही क्यों... वही मारेगा जिसे नेताओं ने इस हाल में पहुंचा दिया है.. आखिर आम आदमी तो ऐसा बनने नहीं जाता...

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत उम्दा!!


    एक अपील:

    विवादकर्ता की कुछ मजबूरियाँ रही होंगी, उन्हें क्षमा करते हुए विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

    हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

    -समीर लाल ’समीर’

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुंदर कविता आज आप ने दिल खुश कर दिया, सुनील दत्त जी से असहमत.... मुझे अगर मोका मिले तो मै एक नही हजार जुते मारुंगा,मैने आज तक कोई ऎसा काम नही किया जिस के लिये मेरी आंखे झुके

    उत्तर देंहटाएं
  11. कविता पढ़ कर आनंद आ गया........

    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  12. Bahut sundar likha hai ... netaaon par achhaa vyang sadha hai aapne ..

    Sach mein inka man, tan, sab kuch kaala hai ...

    उत्तर देंहटाएं
  13. "तन भी काला, मन भी काला, काली सब करतूतें,
    ऐसे नेताओं को मारो,बिना गिने ही जूते,
    करना मत इनका सम्मान,
    मत करना इनका गुणगान,"




    सत्य वचन महाराज !! यही होना चाहिए इन के साथ तो !!

    उत्तर देंहटाएं
  14. शास्त्री जी आज के राजनीतिज्ञ परिवेश और सत्ताधारी नेताओं पर एक सटीक कटाक्ष..ऐसा है ही पर पता नही ये लोग कब सुधार पाएँगे...बहुत बढ़िया प्रस्तुति..बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  15. ज्ञानदत्त और अनूप की साजिश को बेनकाब करती यह पोस्ट पढिये।
    'संभाल अपनी औरत को नहीं तो कह चौके में रह'

    उत्तर देंहटाएं

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