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मंगलवार, 8 जून 2010
सोमवार, 7 जून 2010
“व्यञ्जनावली-तवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
रविवार, 6 जून 2010
“व्यञ्जनावली-टवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
"ट" "ट" से टहनी और टमाटर! अंग्रेजी भाषा है टर-टर! हिन्दी वैज्ञानिक भाषा है, सम्बोधन में होता आदर!! "ठ" "ठ" से ठेंगा और ठठेरा! दुनिया में ठलुओं का डेरा! ठग लोगों को बहकाता है, तोड़ डालना इसका घेरा!! "ड" "ड" से बनता डम्बिल-डण्डा! डलिया में मत रखना अण्डा! रूखी-सूखी को खाकर के, पानी पीना ठण्डा-ठण्डा!! "ढ" "ढ" से ढक्कन ढककर रखना! ढके हुए ही फल को चखना! मनमाने मत ढोल बजाना, सच्चाई को सदा परखना!! "ण" "ड" को बोलो नाक बन्दकर! मुख से "ण" का निकलेगा स्वर! झण्डे-डण्डे में आधा “ण”, सदा लगाना होता हितकर!! |
“व्यञ्जनावली-चवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
शनिवार, 5 जून 2010
“व्यञ्जनावली-कवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| ♥ व्यञ्जनावली-कवर्ग ♥ "क" "क" से कलम हाथ में लेकर! लिख सकते हैं कमल-कबूतर!! "क" पहला व्यञ्जन हिन्दी का, भूल न जाना इसे मित्रवर!! "ख" "ख" से खम्बा और खलिहान! खेत जोतता श्रमिक किसान!! "ख" से खरहा और खरगोश, झाड़ी जिसका विमल वितान!! "ग" "ग" से गङ्गा, गहरी धारा! गधा भार ढोता बेचारा!! "ग" से गमला घर में लाओ, फूल उगाओ इसमें प्यारा!! "घ" "घ" से घण्टा-घर-घड़ियाल! घड़ी देख कर समय निकाल!! "घ" से घड़ा भरो पानी से, जल पी कर हो जाओ निहाल!! "ङ" "ग" को नाक बन्द कर बोलो! अब अपने मुँह को तुम खोलो!! "ङ" का उच्चारण गूँजेगा, कानों में मिश्री सी घोलो!! |
शुक्रवार, 4 जून 2010
“स्वरावली” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
"अ" ‘‘अ‘’ से अल्पज्ञ सब, ओम् सर्वज्ञ है। ओम् का जाप, सबसे बड़ा यज्ञ है।। ‘‘आ’’ ‘‘आ’’ से आदि न जिसका, कोई अन्त है। सारी दुनिया का आराध्य, वह सन्त है।। ‘‘इ’’ ‘‘इ’’ से इमली खटाई भरी, खान है। खट्टा होना खतरनाक, पहचान है।। ‘‘ई’’ ‘‘ई’’ से ईश्वर का जिसको, सदा ध्यान है। सबसे अच्छा वही, नेक इन्सान है।। ‘‘उ’’ उल्लू बन कर निशाचर, कहाना नही। अपना उपनाम भी यह धराना नही।। ‘‘ऊ’’ ऊँट का ऊँट बन, पग बढ़ाना नही। ऊँट को पर्वतों पर, चढ़ाना नही।। ‘‘ऋ’’ ‘‘ऋ’’ से हैं वह ऋषि, जो सुधारे जगत। अन्यथा जान लो, उसको ढोंगी भगत।। ‘‘ए’’ ‘‘ए’’ से है एकता में, भला देश का। एकता मन्त्र है, शान्त परिवेश का।। ‘‘ऐ’’ ‘‘ऐ’’ से तुम ऐठना मत, किसी से कभी। हिन्द के वासियों, मिल के रहना सभी।। ‘‘ओ’’ ‘‘ओ’’ से बुझती नही, प्यास है ओस से। सारे धन शून्य है, एक सन्तोष से।। ‘‘औ’’ ‘‘औ’’ से औरों को पथ, उन्नति का दिखा। हो सके तो मनुजता, जगत को सिखा।। ‘‘अं’’ ‘‘अं’’ से अन्याय सहना, महा पाप है। राम का नाम सबसे, बड़ा जाप है।। ‘‘अः’’ ‘‘अः’’ के आगे का स्वर,अब बचा ही नही। इसलिए, आगे कुछ भी रचा ही नही।। |
गुरुवार, 3 जून 2010
“अब आ जाओ कृष्ण-कन्हैया” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
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