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मंगलवार, 8 जून 2010

“व्यञ्जनावली-पवर्ग” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कल अन्तस्थ और परसों ऊष्म पर 
मुक्तक लगाने है!
उसके बाद फिर से 
अपने रंग में आ जाऊँगा!
patti1_thumb[5]


"प"

kn


"प" से पर्वत और पतंग!
पत्थर हैं पहाड़ के अंग!

मानो तो ये महादेव हैं,
बहुत निराले इनके ढंग!!

"फ"
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फ से फल गुण का भण्डार!
फल सबसे अच्छा आहार!

फ से बन जाता फव्वारा,
फव्वारे की ऊँची धार!!

"ब"



"ब" से बरगद है बन जाता!
घनी छाँव हमको दे जाता!

ब से बगुला, बकरी-बच्चा,
बकरी-बकरा पत्ते खाता!!

"भ"



   "भ" से भगत, भक्ति में लीन!
तन-मन ईश्वर में तल्लीन!!

कर्म भाग्य का निर्माता है,
अकर्मण्य जन भाग्य-विहीन!!

"म"
IMG_0856


"म" से मछली जल की रानी!
मछली का जीवन है पानी!

माता का नाता ममता से,
ममता कभी नही बेगानी!!

13 टिप्‍पणियां:

  1. मुग्ध करती हुई व्यंजनावली ....सुन्दर प्रस्तुति

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  2. यह आपका बहुत बड़ा उपकार है हम सब पर ! नमन आपको !

    उत्तर देंहटाएं
  3. शास्त्री जी आपकी मेहनत देखकर तो मैं हैरान हूं। लगातार पढ़ रहा हूं आपको... काफी अच्छा लग रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह आपका बहुत बड़ा उपकार है हम सब पर ! नमन आपको !

    उत्तर देंहटाएं
  5. badhiya sirji maja aa raha hai..kuch chhoot gayi hai...unhe bhi baad me padhunga

    उत्तर देंहटाएं
  6. खेल खेल में बच्‍चे सबकुछ सीख जाएंगे .. बहुत बढिया काम कर रहे हैं आप !!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया व्यंजनावली ! बेहतरीन प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह वाह ! गुरुदेव आनंद आ गया ...आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  9. बेहद सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  10. shastri ji aapki tareef me kuchh kahna to surye ko dipak dikhane wali baat hai..shreshth prastuti hoti hai aapki.

    vyanjnawli padh kar to mujhe itna aanand aata he ki kash mere bacchhe chhote hote to main unhe u hi smaran karati. ha.ha.ha.

    उत्तर देंहटाएं

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