![]() आ गई हैं सर्दियाँ मस्ताइए। बैठकर के धूप में सुस्ताइए।। पर्वतों पर नगमगी चादर बिछी. बर्फबारी देखने को जाइए। बैठकर के धूप में सुस्ताइए।। रोज दादा जी जलाते हैं अलाव, गर्म पानी से हमेशा न्हाइए। बैठकर के धूप में सुस्ताइए।। रात लम्वी, दिन हुए छोटे बहुत, अब रजाई तानकर सो जाइए। बैठकर के धूप में सुस्ताइए।। खूब खाओ सब हजम हो जाएगा, शकरकन्दी भूनकर के खाइए। बैठकर के धूप में सुस्ताइए।। |
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सोमवार, 12 दिसंबर 2011
"बर्फबारी देखने को जाइए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
रविवार, 11 दिसंबर 2011
"झीना-झीना उजियारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
कल केवल कुहरा आया था, अब बादल भी छाया है। हाय भयानक इस सर्दी ने, सबका हाड़ कँपाया है।। भीनी-भीनी पड़ी फुहारें, झीना-झीना उजियारा। आग सेंकता सरजू दादा, दिन में छाया अँधियारा। कॉफी और चाय का प्याला, सबसे ज्यादा भाया है।। आलू और शकरकन्दी भी, सबके मन को भाते हैं। गर्म-गर्म गाजर का हलवा, खुश होकर सब खाते हैं। कम्बल-लोई और कोट से, कोमल बदन छिपाया है।। हीटर-गीजर और अँगीठी, गज़क, रेवड़ी-मूँगफली। गर्म समोसे, टिक्की-डोसा, अच्छी लगती हैं इडली। मौसम के अनुकूल बया ने, सुन्दर नीड़ बनाया है।। |
शनिवार, 10 दिसंबर 2011
"मन को मत इतना भरमाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
![]() मुझको पाठ पढ़ाने वाले, मन को मत इतना भरमाओ। रीती गागर में, धीरे-धीरे भरते जाओ।। ठाठ-बाट में, तुम रहते हो, बारिश धूप नहीं सहते हो, लेकिन हम ठहरे सैलानी, करते रहते हैं नादानी, बंजारों की इस दुनिया से, सोच-समझकर हाथ मिलाओ। रूखा-सूखा हम खाते हैं, मंजिल पर चलते जाते हैं, गन्धहीन अपना उपवन है, दिशाहीन जीवन-दर्शन है, कंकड़-पत्थर वाले पथ पर, मत अपने तुम कदम बढ़ाओ। साँझ हुई, कर लिया बसेरा, सुबह हुई तो, उखड़ा डेरा, रोज नया है ठौर-ठिकाना, नई जगह पर रोना-गाना, दुनियादारी की झंझा में, मत अपने को तुम उलझाओ। ![]() |
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011
"मजबूरी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
ठिठुरन से मित्रता
भास्कर ने जोड़ ली।
निर्धनता खोज रही
आग के अलाव,
ईंधन के बढ़ गये
ऐसे में भाव।
जंगलों का दोहन,
ठण्ड से काँप रहा
कोमल बदन,
कूड़े से पन्नियाँ
बीन रहा बचपन।
कुहरा तो एक दिन
छँट ही जायेगा.
उसके बाद सूरज भी
गर्मी दिखायेगा।
सर्दी में कम्पन,
गर्मी में स्वेदकण
झेलना जरूरी है.
नून, तेल-आटे को
लाना मजबूरी है।।
गुरुवार, 8 दिसंबर 2011
"आभासी संसार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
देखो कितना भिन्न है, आभासी संसार। शब्दों से लड़ते रहो, लेकर क़लम-कटार।। ज़ालजगत पर हो रही, चिट्ठों की भरमार। गीत, कहानी-हास्य की, महिमा अपरम्पार।। पण्डे-जोशी को नहीं, खोज रहा यजमान। जालजगत पर हो रहा, ग्रह-नक्षत्र मिलान।। नवयुग में सबसे बड़ा, ज्ञानी अन्तर्जाल। इसकी झोली में भरा, सभी तरह का माल।। स्वाभिमान के साथ में, रहो सदा आनन्द। अपने बूते पर लिखो, सभी विधा निर्द्वन्द।। |
बुधवार, 7 दिसंबर 2011
"कंचन विमल-वितान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
गुलदस्ता जैसा लगे, ब्लॉगिंग का संसार। टिप्पणियों से पोस्ट का, बढ़ जाता शृंगार।१। जल्दी-जल्दी बाँट दे, निज गठरी का ज्ञान। नहीं साथ में जाएगा, कंचन विमल-वितान।२। ज्वाला ठण्डी पड़ गई, राख हुए अंगार। साजन के ही साथ में, गये सभी सिंगार।३। पात पीत जब हो गये, हरे-भरे नहीं होय। इस असार संसार में, अमर हुआ नहीं कोय।४। जीत न पाये काल को, क्या ज्ञानी क्या सन्त। ग्रास मौत का बन गये, वैज्ञानिक-गुणवन्त।५। |
मंगलवार, 6 दिसंबर 2011
"रोज हाट से लौकी लाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
लौकी होती गुणकारी है। बीमारी इससे हारी है।। रोज हाट से लौकी लाओ। छीलो-काटो और पकाओ।। सब्ज़ी या रायता बनाओ। रोटी-पूड़ी के संग खाओ।। चाहे इसका जूस निकालो। थोड़ा काला नमक मिलालो।। रोज सवेरे यह रस पी लो। आनन्दित हो जीवन जी लो।। यह रसायन हितकारी है। इसीलिए लौकी प्यारी है।। |
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