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रविवार, 11 दिसंबर 2011

"झीना-झीना उजियारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

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कल केवल कुहरा आया था,
अब बादल भी छाया है।
हाय भयानक इस सर्दी ने,
सबका हाड़ कँपाया है।।

भीनी-भीनी पड़ी फुहारें,
झीना-झीना उजियारा।
आग सेंकता सरजू दादा,
दिन में छाया अँधियारा।
कॉफी और चाय का प्याला,
सबसे ज्यादा भाया है।।

आलू और शकरकन्दी भी,
सबके मन को भाते हैं।
गर्म-गर्म गाजर का हलवा,
खुश होकर सब खाते हैं।
कम्बल-लोई और कोट से,
कोमल बदन छिपाया है।।

हीटर-गीजर और अँगीठी,
गज़क, रेवड़ी-मूँगफली।
गर्म समोसे, टिक्की-डोसा,
अच्छी लगती हैं इडली।
मौसम के अनुकूल बया ने,
सुन्दर नीड़ बनाया है।।

17 टिप्‍पणियां:

  1. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 12-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. मौसम के मनोहारी छटा को बताती सुंदर रचना.....लाजवाब।

    उत्तर देंहटाएं
  3. कई दशकों से झारखण्ड छोड़कर, सर्दियों में लखनऊ नहीं गया हूँ | इस बार झाँसी से बेटी को लाना है और बड़ी बेटी को लखनऊ में मिलना है |

    डराइये मत सर्दी से,

    गुरु जी !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. ओह! बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है आपकी.
    सर्दी के रंगों को खूबसूरती से उकेरा है आपने.
    बहुत बहुत आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सर्दी की अच्छी अच्छी डिशेज़...वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  6. ठंड की ठिठुरन में खाने का मजा ....वाह!!! मजा आ गया.

    उत्तर देंहटाएं
  7. हीटर-गीजर और अँगीठी,
    गज़क, रेवड़ी-मूँगफली।

    -- वाह ! ! 'पहाड़ों' की ठण्ड याद आगई.

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह।
    ठंड के मौसम में सच में ये सब प्‍यारे लगते हैं।
    सुंदर रचना।

    उत्तर देंहटाएं

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