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शनिवार, 10 दिसंबर 2011

"मन को मत इतना भरमाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मुझको पाठ पढ़ाने वाले,
मन को मत इतना भरमाओ।
रीती गागर में, सागर को,
धीरे-धीरे भरते जाओ।।

ठाठ-बाट में, तुम रहते हो,
बारिश धूप नहीं सहते हो,
लेकिन हम ठहरे सैलानी,
करते रहते हैं नादानी,
बंजारों की इस दुनिया से,
सोच-समझकर हाथ मिलाओ।

रूखा-सूखा हम खाते हैं,
मंजिल पर चलते जाते हैं,
गन्धहीन अपना उपवन है,
दिशाहीन जीवन-दर्शन है,
कंकड़-पत्थर वाले पथ पर,
मत अपने तुम कदम बढ़ाओ।

साँझ हुई, कर लिया बसेरा,
सुबह हुई तो, उखड़ा डेरा,
रोज नया है ठौर-ठिकाना,
नई जगह पर रोना-गाना,
दुनियादारी की झंझा में,
मत अपने को तुम उलझाओ।
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25 टिप्‍पणियां:

  1. साँझ हुई, कर लिया बसेरा,
    सुबह हुई तो, उखड़ा डेरा,
    रोज नया है ठौर-ठिकाना,
    नई जगह पर रोना-गाना,
    दुनियादारी की झंझा में,
    मत अपने को तुम उलझाओ।………………यही तो जीवन सत्य है………सुन्दर भावाव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर और सटीक भावाव्यक्ति। धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  3. कविता का तो जवाब नहीं, तस्वीर भी कमाल की लगाई है आपने।

    उत्तर देंहटाएं
  4. दुनियादारी, उतनी जितनी है आवश्यक।

    उत्तर देंहटाएं
  5. क्या निराले ठाट /अंदाज हैं जी ",दिशाहीन जीवन -दर्शन है "किसी ने कहा है - मत पूछो साधू की जात ..../ सच है पानी का रंग- हीन होना ही उसकी सार्थकता है....

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...चित्र भी सुन्दर|

    उत्तर देंहटाएं
  7. बढ़िया चित्र सुंदर है रचना,
    इस कविता का क्या कहना

    मेरे नई पोस्ट..आज चली कुछ ऐसी बातें, बातों पर हो जाएँ बातें

    ममता मयी हैं माँ की बातें, शिक्षा देती गुरु की बातें
    अच्छी और बुरी कुछ बातें, है गंभीर बहुत सी बातें
    कभी कभी भरमाती बातें, है इतिहास बनाती बातें
    युगों युगों तक चलती बातें, कुछ होतीं हैं ऎसी बातें

    में आपका इंतजार है,...

    उत्तर देंहटाएं
  8. मुझे नहीं लगता कि कवि अपने मंतव्य को लेकर सजग है. एक ओर वह रीती गागर भरने का आग्रह करता है, दूसरी ओर ऐसा करने वाले पर भरमाने का आरोप भी लगाता है. दिशाहीनता का बोध परंतु दूसरों से कुछ न सीखने की जिद, आवारापन और हठ के सिवाय क्या है. पूरी कविता बिखरी हुई है, ऐसी तुकबंदी जो पढ़ने में आनंद देती है.

    उत्तर देंहटाएं
  9. क्‍या बात है....
    गजब का जीवन दर्शन।
    ऐसा कर लें तो फिर चिंताएं गायब, उलझनें नदारद।

    उत्तर देंहटाएं
  10. अलमस्त जिंदगी का खूबसूरत फसाना.बेहतरीन.
    आदरणीय कवि नीरज की कविता याद आ गई:
    हम तो मस्त फकीर हमारा कोई नहीं ठिकाना रे
    जैसा अपना आना प्यारे, वैसा अपना जाना रे....

    उत्तर देंहटाएं

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