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बुधवार, 7 दिसंबर 2011

"कंचन विमल-वितान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

गुलदस्ता जैसा लगे, ब्लॉगिंग का संसार।
टिप्पणियों से पोस्ट का, बढ़ जाता शृंगार।१।

जल्दी-जल्दी बाँट दे, निज गठरी का ज्ञान।
नहीं साथ में जाएगा, कंचन विमल-वितान।२।

ज्वाला ठण्डी पड़ गई, राख हुए अंगार।
साजन के ही साथ में, गये सभी सिंगार।३।

पात पीत जब हो गये, हरे-भरे नहीं होय।
इस असार संसार में, अमर हुआ नहीं कोय।४।

जीत न पाये काल को, क्या ज्ञानी क्या सन्त।
ग्रास मौत का बन गये, वैज्ञानिक-गुणवन्त।५।

20 टिप्‍पणियां:

  1. टिप्पणियाँ पोस्ट का शृंगार हैं, वाह।

    उत्तर देंहटाएं
  2. फिर भी लोग हैं कि मानते नहीं

    टिप्पणियों से पोस्ट का, बढ़ जाता शृंगार...

    टिप्पणी से भी किनारा कर लेते हैं। हाहाहहाहा
    बहुत बढिया

    उत्तर देंहटाएं
  3. टिप्पणियों से ही ब्लोगरों का लिखने का हौसला
    बढता है,...बहुत सुंदर पोस्ट,...
    मेरे नए पोस्ट में आपका इंतजार है,....

    उत्तर देंहटाएं
  4. पात पीत जब हो गये, हरे-भरे नहीं होय।
    इस असार संसार में, अमर हुआ नहीं कोय।४।

    gahan abhivyakti ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर सीख देती रचना दिल मे उतर गयी……………शानदार प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुंदर सीख देती रचना ...आज आपको एक नए ब्लॉग का लिंक दे रही हूँ कृपया वहाँ आकार अपने सुझाव ज़रूर प्रदान करें
    http://aapki-pasand.blogspot.com/2011/12/blog-post_07.html

    उत्तर देंहटाएं
  7. har dohe mein jivan ke liye gahri soch hai...

    जल्दी-जल्दी बाँट दे, निज गठरी का ज्ञान।
    नहीं साथ में जाएगा, कंचन विमल-वितान।२।

    shubhkaamnaayen.

    उत्तर देंहटाएं
  8. शास्त्रीजी नमस्ते, सर्वप्रथम आपका आभार कि आपने मेरी पोस्ट चर्चामंच पर शामिल कर मेरा होसला बढाया है |
    अब आपकी पोस्ट पर-आपने ब्लोगिंग संसार की तुलना गुलदस्ते से की है जो हकीकत है तरह-तरह के विचारों का आदान-प्रदान होना,सहजता से स्वयं को अभिव्यक्त करना,अन्य ब्लोगेर्स के साथ संवाद की तरह उनकी पोस्ट के विषय पर अपने विचारों को भी व्यक्त करना सब कुछ कितना आसन हो गया है |

    उत्तर देंहटाएं
  9. सही कहा....
    टिप्‍पणियो से श्रृंगार तो बढता ही है..... हौसला भी बढता है।

    उत्तर देंहटाएं

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