१७००वाँ
पुष्प
बहारों का भरोसा
क्या, न जाने रूठ जायें कब?
सहारों का भरोसा
क्या, न जाने छूट जायें कब?
अज़ब हैं रंग
दुनिया के, अज़ब हैं ढंग लोगों के
इशारों का भरोसा
क्या, न जाने लूट जायें कब?
चलाना संभलकर
चप्पू, नदी की तेज है धारा,
किनारों का भरोसा
क्या, न जाने घूँट जायें कब
न कहना राज-ए-दिल
अपना, कभी सूखे सरोवर से
फुहारों का भरोसा
क्या, न जाने फूट जायें कब?
दमकते “रूप” का सोना, हमारी आँख का धोखा
सितारों का भरोसा
क्या, न जाने टूट जायें कब?
|
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रविवार, 21 अप्रैल 2013
"1700वीं पोस्ट-बहारों का भरोसा क्या?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
शनिवार, 20 अप्रैल 2013
"ग़ज़ल-फूल खिलते हैं चमन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
जिन्दगी सबकी बनी है, गुनगुनाने के लिए
फूल खिलते हैं चमन में,
मन रिझाने के लिए
सेंकते सब सर्दियों में, गुनगुनी सी धूप को
गर्मियों में सूर्य आता,
तन जलाने के लिए
आपसी सम्बन्ध के, धागे बहुत नाज़ुक यहाँ
उम्र जाती है ग़ुज़र,
रिश्ते बनाने के लिए
हो सके तो भूल जा, अपनी वफाओं का सिला
नेकियाँ होती नहीं,
उनको सुनाने के लिए
तल्ख़ियों से तल्ख़ियाँ, लेती जनम संसार में
तू यहाँ आया,
सुरीले गीत गाने के लिए
मत ज़माने को दिखाना, उस घिनौने "रूप" को
आदमी है आदमीयत को,
दिखाने के लिए
|
शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013
"क्रिस्टिना रोसेट्टी की कविता का अनुवाद" अनुवादक : डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
Remember : Christina Rossetti
अनुवादक : डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
मैं जब दूर चला जाऊँगा,
मेरी याद तुम्हें आयेगी!
जब हो जाऊँगा चिरमौन,
तुम्हें यादें तड़पायेंगी!
मृत हो जायेगी यह देह,
चला जाऊँगा शान्त नगर में!
पकडकर तब तुम मेरा हाथ,
पुकारोगी मुझको स्वर में!
नही अधूरी मंजिल से,
मैं लौट पाऊँगा!
तुमसे मैं तो दूर,
बहुत ही दूर चला जाऊँगा!
इक क्षण ऐसा भी आयेगा!
मम् अस्तित्व सिमट जायेगा!
तुम सवाँर लेना अपना कल!
नई योजना बुनना प्रतिपल!
यादें तो यादें होती है,
तब तुम यही समझना!
मुझ अदृश्य के लिए,
नही तुम कभी प्रार्थना
करना!
ऐसा करते-करते इक दिन,
भूल मुझे जाओगी!
किन्तु अगर तुम याद करोगी,
दुःख बहुत पाओगी!!
Christina
Rossetti
Christina
Georgina Rossetti
जन्म: 5 दिसम्बर, 1839
मृत्यु: 29 दिसम्बर, 1884
|
गुरुवार, 18 अप्रैल 2013
"टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों!
यह रचना आज से डेढ़ साल पहले लिखी थी!
कल हमारा टॉम हमसे विदा हो चुका है।
आज उस को इंगित करके लिखी गयी
टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे।
दोनों चौकीदार हमारे।।
हमको ये लगते हैं अच्छे।
दोनों ही हैं सीधे-सच्चे।।
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जब हम इनको हैं नहलाते।
ये खुश हो साबुन मलवाते।।
बाँध चेन में इनको लाते।
बाबा कंघी से सहलाते।।
इन्हें नहीं कहना बाहर के।
संगी-साथी ये घरभर के।।
ये दोनों हैं बहुत सलोने।
सुन्दर से जीवन्त खिलौने।।
|
बुधवार, 17 अप्रैल 2013
"टॉम हमारा साथ छोड़कर चला गया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
हम
सबकी आँखों का तारा साथ छोड़कर चला गया।
पला-बढ़ा
था ठाठ-बाट में,
आठ
वर्ष तक रहा साथ में,
चौकीदारी
करनेवाला साथ छोड़कर चला गया।
बीमारी
की जीत हो गयी,
मृत्यु
उसकी मीत हो गयी,
घरभर
का ये राजदुलारा साथ छोड़कर चला गया।
आज
फिरंगी सोच रहा है,
व्याकुल
होकर खोज रहा है,
मेरा
प्यारा भाई, मेरा साथ छोडकर चला गया।
शोक
आज घर में छाया है,
सबका
ही मन भर आया है,
सच्चा
पहरेदार हमारा साथ छोड़कर चला गया।
हम सबकी आँखों का तारा साथ छोड़कर चला गया।। |
मंगलवार, 16 अप्रैल 2013
"बूढ़ा बरगद जिन्दा है..." (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।।
बाबू-अफसर-नेता करते, खुलेआम रिश्वतखोरी,
जिनका खाते माल, उन्हीं से करते हैं सीनाजोरी,
मक्कारी के जालों में, उलझा मासूम परिन्दा है।
करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।।
माँ-बहनों की लज्जा लुटती, गलियों में-बाजारों में,
गुण्डागर्दी करने वाले, शामिल हैं सरकारों में,
लालन-पालन करने वाला, परेशान कारिन्दा है।
करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।।
लोकतन्त्र में शासन करने के, सब ही अधिकारी हैं,
कुटुम-कबीलों की इसमे, क्यों होती भागीदारी हैं,
कब छोड़ोगे सिंहासन को कहता हर बाशिन्दा है।
करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।।
ओछी गगरी घनी छलकती, भरी हुई चुपचाप रहे,
जिसकी दाढ़ी में तिनका है, वही ज्ञान की बात कहे,
घोटाले करने वाला ही, करता चुगली-निन्दा है।
करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।।
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सोमवार, 15 अप्रैल 2013
"माला बन जाया करती है..." (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सपनों में छाया करती है!
तब मेरे मन में शब्दों की,
माला बन जाया करती है!!
निर्धारित कुछ समय नही है,
कोई अर्चना-विनय नही है,
जब-जब निद्रा में होता हूँ,
तब-तब यह आया करती है!
माला बन जाया करती है!!
शोला बनकर आग उगलते,
कहाँ-कहाँ से शब्द निकलते,
चिंगारी जब धधक उठे तो,
ज्वाला बन जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!
दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
धनवानों की कथा देखकर,
दर्पण दिखलाने को मेरी,
कलम मचल जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!
भँवरे ने जब राग सुनाया,
कोयल ने जब गाना गाया,
मधुर स्वरों को सुनकर मेरी,
नींद टूट जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!
वैरी ने हुँकार भरी जब,
धनवा ने टंकार करी तब,
नोक लेखनी की तब मेरी,
भाला बन जाया करती है!
माला बन जाया करती है!!
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