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गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

"टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
यह रचना आज से डेढ़ साल पहले लिखी थी!
कल हमारा टॉम हमसे विदा हो चुका है।
आज उस को इंगित करके लिखी गयी 
इस पुरानी कविता को प्रस्तुत कर रहा हूँ!
टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे।
दोनों चौकीदार हमारे।।

हमको ये लगते हैं अच्छे।
दोनों ही हैं सीधे-सच्चे।।
जब हम इनको हैं नहलाते।
ये खुश हो साबुन मलवाते।।  

बाँध चेन में इनको लाते।
बाबा कंघी से सहलाते।।
IMG_1731
इन्हें नहीं कहना बाहर के।
संगी-साथी ये घरभर के।।

ये दोनों हैं बहुत सलोने।
सुन्दर से जीवन्त खिलौने।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दुख हुआ जानकर, आत्मीयता हो जाती है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस दुख पर मेरी संवेदनायें।
    सुन्दर रचना पर बधाई गुरूदेव।

    उत्तर देंहटाएं
  3. इनका जाना बहुत दुख देता है... :(
    ~सादर!!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत दुःख होता है सबके प्यार में बंधे इन जीवों के हमेशा के लिए दूर चले जाने पर ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. घर के सदस्य ही बन जाते हैं ये भी..... दुखद

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर रचना,**** जीवों के हमेशा के लिए दूर चले जाने पर बहुत दुःख होता है

    उत्तर देंहटाएं
  8. जानवर प्यार के अहसास को भूलने नहीं देते
    त्याग विश्वास कि मूर्ति
    तेरे मन में राम [श्री अनूप जलोटा ]

    उत्तर देंहटाएं

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