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शनिवार, 20 अप्रैल 2013

"ग़ज़ल-फूल खिलते हैं चमन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जिन्दगी सबकी बनी है, गुनगुनाने के लिए 
फूल खिलते हैं चमन में, मन रिझाने के लिए 

सेंकते सब सर्दियों में, गुनगुनी सी धूप को 
गर्मियों में सूर्य आता, तन जलाने के लिए 

आपसी सम्बन्ध के
, धागे बहुत नाज़ुक यहाँ  
उम्र जाती है ग़ुज़र, रिश्ते बनाने के लिए 

हो सके तो भूल जा
, अपनी वफाओं का सिला 
नेकियाँ होती नहीं, उनको सुनाने के लिए 

तल्ख़ियों से तल्ख़ियाँ
, लेती जनम संसार में 
तू यहाँ आया, सुरीले गीत गाने के लिए 

मत ज़माने को दिखाना
, उस घिनौने "रूप" को 
आदमी है आदमीयत को, दिखाने के लिए 

20 टिप्‍पणियां:

  1. मत ज़माने को दिखाना, उस घिनौने "रूप" को
    आदमी है आदमीयत को, दिखाने के लिए
    ..सच इंसान में इंसानियत न हो तो वह इंसान कहलाने योग्य नहीं .. इंसानियत की तौहीन है वह ..
    ..बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर प्रस्तुति |
    शुभकामनायें आदरणीय||

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपसी सम्बन्ध के, धागे बहुत नाज़ुक यहाँ
    उम्र जाती है ग़ुज़र, रिश्ते बनाने के लिए,,,,,

    बहुत उम्दा अभिव्यक्ति,सुंदर गजल ,,,
    RECENT POST : प्यार में दर्द है,

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुदिश, बहुमुखी,बहुरंग शेर !वधाई !!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बढ़िया प्रस्तुति शास्त्री जी ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए कल 22/04/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर ग़ज़ल.....
    मेरे पोस्ट "अब और नहीं सहेंगे..." पर सादर आमंत्रित.

    उत्तर देंहटाएं
  8. नेकी कर दरिया में डाल -बहुत खूब -

    हो सके तो भूल जा, अपनी वफाओं का सिला
    नेकियाँ होती नहीं, उनको सुनाने के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह बेहद खुबसुरत सार्थक रचना |

    उत्तर देंहटाएं
  10. हो सके तो भूल जा, अपनी वफाओं का सिला
    नेकियाँ होती नहीं, उनको सुनाने के लिए

    ..वाह! बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल...

    उत्तर देंहटाएं
  11. भला कर भूल जा!!.......बहुत बढ़िया रचना ,महोदय.


    उत्तर देंहटाएं

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