जन-जन की अपनी ही
भाषा,
हिन्दी हुई परायी
क्यों?
दूर देश से चलकर,
भारत में अंग्रेजी आयी
क्यों?
माता के सुहाग की
बिन्दी,
वैज्ञानिक भाषा है
हिन्दी,
निर्मल-पावन जो पहले
थी,
अब मैली क्यों हैं कालिन्दी,
छोड़ मातृभाषा को
हमने,
अंग्रेजी अपनायी
क्यों?
दूर देश से चलकर,
भारत में अंग्रेजी आयी
क्यों?
देश-वेश-परिवेश
हमारे,
गौरैया ने छीन लिये,
गीत और संगीत
हमारे,
ताल-वाद्य से हीन
किये,
सम्बोधन में नहीं
तरलता,
कर्कश बोली भायी
क्यों?
दूर देश से चलकर,
भारत में अंग्रेजी आयी
क्यों?
पिंगल के हम स्वामी थे,
हम छन्दों के निर्वाहक
थे,
गीत-ग़ज़ल,
दोहा-चौपाई,
के हम ही संवाहक
थे,
भूल गये अपनी
विद्या को,
उसकी अंग लगायी
क्यों?
दूर देश से चलकर,
भारत में अंग्रेजी आयी
क्यों?
हमने अपने हाथों से
ही,
अपना “रूप” बिगाड़
दिया,
माता का सिन्दूर
पोंछकर,
अटल सुहाग उजाड़
दिया,
आज चमन के माली ही,
खुद नोच रहे अमरायी
क्यों?
दूर देश से चलकर,
भारत में अंग्रेजी आयी
क्यों?
|
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |

वाकई सुन्दर विचारोत्तेजक प्रस्तुति !!
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया चिंतन
जवाब देंहटाएंअंग्रेज तो गए लेकिन अंग्रेजी थोप गए ...
सुन्दर भाव और शब्द ! वास्तव में अंग्रेज़ी एक आडम्बर की भाँति सर पर लड़ी है ! अबतो हिन्दी में सब का म आसान है ! फिर हिन्दी की लत एक गुलामी का प्रतीक नहीं है ?
जवाब देंहटाएंभाखा आपनी बोलिए, लिये पराई सीख ।
जवाब देंहटाएंरंग रस घोरें आपने, ले दूजन की लीख |226|
भावार्थ : -- "पराए की सिखाई नहीं बोलनी चाहिए" या पराए से सीख(ज्ञान)लेकर, अपनी भाषा ही बोलनी चाहिए या पराई भाषाएँ तो सिखनी चाहिए और बोलनी अपनी चाहिए । यदि लिपि भी पराई हो तो अपनी ही सभ्यता और संस्कृति के रंग भरने चाहिए क्योंकि भारत की संस्कृति एवं सभ्यता सबसे प्राचीन और सबसे श्रेष्ठ है ॥
बहुत सुंदर रचना ।
जवाब देंहटाएंअति सुन्दर , सवालों के जवाब को ढूँढने के प्रयास में जुटी रचना
जवाब देंहटाएंहमने अपने हाथों से ही,
जवाब देंहटाएंअपना “रूप” बिगाड़ दिया,
माता का सिन्दूर पोंछकर,
अटल सुहाग उजाड़ दिया,
आज चमन के माली ही,
खुद नोच रहे अमरायी क्यों?
दूर देश से चलकर,
भारत में अंग्रेजी आयी क्यों?
बहुत सुन्दर भाव की रचना है भारत की विशेषता है जो भी यहां आया उसको गले लगाया अपनाया। अंग्रेजी भी इसका अपवाद नहीं आज वह हिंगलिश है भारत के बाहर होगी अंग्रेजी।
bahut umdaa...
जवाब देंहटाएंदोष अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा का नहीं है उसे अपनाकर निज भाषा को भुला देने वालों का है..
जवाब देंहटाएं