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मंगलवार, 23 सितंबर 2014

"ग़ज़ल-रास्ता अपना सरल कैसे करूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

भाव अपनी ग़ज़ल में कैसे भरूँ
शब्द को अपने गरल कैसे करूँ

फँस गया अपने बुने ही जाल में
रास्ता अपना सरल कैसे करूँ

तिश्नगी से कण्ठ सूखा जा रहा
आचमन देकर तरल कैसे करूँ

ज़िन्दगी में चाह है, ना राह है
चश्म को अपनी सजल कैसे करूँ

तन-बदन में पड़ गयीं है झुर्रियाँ
“रूप” को अपने नवल कैसे करूँ

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 25/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

    उत्तर देंहटाएं
  3. तिश्नगी से कण्ठ सूखा जा रहा
    आचमन देकर तरल कैसे करूँ

    aapka isteqbaal kaise karoon...aafareen rachna guru jee

    उत्तर देंहटाएं
  4. ज़िन्दगी में चाह है, ना राह है
    चश्म को अपनी सजल कैसे करूँ
    ...वाह..बहुत उम्दा ग़ज़ल..

    उत्तर देंहटाएं

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