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सोमवार, 22 सितंबर 2014

"दोहे-महँगाई उपहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब से छोटा हो गया, रुपये का आकार।
तब से बौना हो गया, रिश्तों का संसार।।
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बिगड़ रही है व्यवस्था, बेबस है सरकार।
कीमत रुपये की घटी, मँहगाई की मार।।
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आम जरूरत का हुआ, मँहगा सब सामान।
ऐसी हालत देख कर, जनता है हैरान।।
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फोन-कार के कर दिये, अब तो सस्ते रेट।
लेकिन कैसे भरेगा, इनसे भूखा पेट।।
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सब्जी और अनाज के,  बढ़े हुए हैं भाव।
अब तक भी आया नहीं, कीमत में ठहराव।।
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तेल कान में डाल कर, सोई है सरकार।
निर्धन जनता के लिए, महँगाई उपहार।।
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अच्छे दिन का हो गया, सपना अब काफूर।
सत्ता मिलते ही हुए, मोदी मद में चूर।।

3 टिप्‍पणियां:

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