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रविवार, 28 सितंबर 2014

"तेल कान में डाला क्यों?" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गुम हो गया उजाला क्यों?
दर्पण काला-काला क्यों?

चन्दा गुम है, सूरज सोया
काट रहे, जो हमने बोया
तेल कान में डाला क्यों?

राज-पाट सिंहासन पाया
सुख भोगा-आनन्द मनाया
फिर करता घोटाला क्यों?

जब खाली भण्डार पड़े हैं
बारिश में क्यों अन्न सड़े हैं
गोदामों में ताला क्यों?

कहाँ गयीं सोने की लड़ियाँ
पूछ रही हैं भोली चिड़ियाँ
सूखी मंजुल माला क्यों?

जनता सारी बोल रही है
न्याय-व्यवस्था डोल रही है
दाग़दार मतवाला क्यों?

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना

    मुंसिफ गूंगा जज़ है बहरा छ्या बहुत कुहासा है
    जीवन के पग पग देखा क्यों नहीं बची अब आशा है

    जवाब देंहटाएं
  2. वर्तमान पर बहुत ही सशक्त कविता। स्वयं शून्य

    जवाब देंहटाएं

  3. जब खाली भण्डार पड़े हैं
    बारिश में क्यों अन्न सड़े हैं
    गोदामों में ताला क्यों?.......andher nagri me yahi to hota hai

    जवाब देंहटाएं
  4. वर्तमान पर बहुत ही सुन्दर रचना ...

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत खूब कहा शास्त्री जी!

    जवाब देंहटाएं
  6. जब खाली भण्डार पड़े हैं
    बारिश में क्यों अन्न सड़े हैं
    गोदामों में ताला क्यों?

    Satya Vachan !!

    जवाब देंहटाएं
  7. आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 1 . 10 . 2014 दिन बुद्धवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

    जवाब देंहटाएं

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