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शनिवार, 13 सितंबर 2014

"मास सितम्बर-हिन्दी भाषा की याद" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


एक साल में मास सितम्बर,
एक बार ही आता है।
अपनी हिन्दी भाषा की,
जो हमको याद दिलाता है।।

कितना क्रूर मज़ाक बनाया,
एक राष्ट्र की दो भाषा।
कामकाज में बनी अग्रणी,
आज देश में परभाषा।

जो अंग्रेजी नहीं जानता,
वो गँवार कहलाता है।
अपनी हिन्दी भाषा की,
जो हमको याद दिलाता है।।

लोकतन्त्र में नौकरशाहों की,
मनमानी चलती है।
जिनके मुख से कर्कश सुर की,
तान निकलती है।
अंग्रेजी की भक्ति के,
हमको भी गुर बतलाता है।
अपनी हिन्दी भाषा की,
जो हमको याद दिलाता है।।

सन्तों की वाणी हिन्दी तो,
जन-जन की उद्बोधक है।
लेकिन अफसर-नेताशाही ही,
पथ में अवरोधक है।  
कॉनवेंट तो असभ्यता के,
पाठ हमें सिखलाता है।
अपनी हिन्दी भाषा की,
जो हमको याद दिलाता है।।

अभी नहीं कुछ भी बिगड़ा है,
अब तो अपने को बदलो।
छोड़ गुलामी की भाषा को,
अब हिन्दी की ओर चलो।
माता के अक्षय सुहाग का,
बिन्दी से ही नाता है।
अपनी हिन्दी भाषा की,
जो हमको याद दिलाता है।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सबके दिन फिरते हैं...हमारे प्रधानमंत्री सरकारी कार्यालयों और विदेशों में भी राजभाषा का प्रयोग कर रहे हैं...ये सराहनीय है...

    उत्तर देंहटाएं
  2. अभी नहीं कुछ भी बिगड़ा है,
    अब तो अपने को बदलो।
    छोड़ गुलामी की भाषा को,
    अब हिन्दी की ओर चलो।
    .........बहुत सटीक ...
    अब भी वक्त है चेत जाने का ..

    उत्तर देंहटाएं

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