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गुरुवार, 25 सितंबर 2014

"महफिलों में मुस्कराना चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दर्दे-दिल अपना छुपाना चाहिए
महफिलों में मुस्कराना चाहिए

ज़िन्दग़ी तो एक प्यारा गीत है
ज़िन्दग़ी को गुनगुनाना चाहिए

फूल के ही साथ रहते शूल हैं
ख़ार से दामन बचाना चाहिए

संगेदिल से राज़ को अपने कभी
हो सके जितना छिपाना चाहिए

इश्क में नादानियाँ अच्छी नहीं
“रूप” को दिल में बसाना चाहिए

7 टिप्‍पणियां:

  1. दर्दे-दिल अपना छुपाना चाहिए
    महफिलों में मुस्कराना चाहिए
    ..सच रो धोकर कोई फायदा नहीं नुक्सान ही होता है ..
    बहुत बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (26.09.2014) को "नवरात महिमा" (चर्चा अंक-1748)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद। नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं

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