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रविवार, 21 सितंबर 2014

"ग़ज़ल-नंगा आदमी भूखा विकास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


दिल्ली उन्हीं के वास्ते, दिल जिनके पास है
खाली है अगर जेब तो, दिल्ली उदास है

चारों तरफ मची हुई है भाग-दौड़ सी
रिश्तो में अब मिठास के बदले खटास है

चलता है टेढ़ी चाल सियासत का पजामा
मैला है मन-बदन मगर उजला लिबास है

पद मिल गया तो देश की चिन्ता नहीं रही
कुर्सी की टाँग से बँधा अब तो विलास है

सागर में रह के मीन को मिनरल की चाह है
बुझती नहीं है आज मगर की पिपास है

रोजी के लिए नौनिहाल माँजता बरतन
हाथों में उसके आज भी झूठा गिलास है

वो देख रहा “रूप” को आजाद वतन के
नंगा है आज आदमी भूखा विकास है

11 टिप्‍पणियां:

  1. यथार्थ को उकेरती शानदार प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  2. रोजी के लिए नौनिहाल माँजता बरतन
    हाथों में उसके आज भी झूठा गिलास है ..
    दिल्ली और देश काल की हकीकत से रूबरू कराता हुआ है हर शेर ....
    बहुत उम्दा ग़ज़ल ... नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी लिखी रचना मंगलवार 23 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. वो देख रहा “रूप” को आजाद वतन के
      नंगा है आज आदमी भूखा विकास है. waah bahut sundar gajal hardik badhai aapko chacha ji

      हटाएं
  4. बहुत ही कटुसत्य के साथ सही संदेश दिया है आप ने ! सत्य के वक्ता श्रोता दुर्लभ ही हैं !

    चलता है टेढ़ी चाल सियासत का पजामा
    मैला है मन-बदन मगर उजला लिबास है

    उत्तर देंहटाएं
  5. रोजी के लिए नौनिहाल माँजता बरतन
    हाथों में उसके आज भी झूठा गिलास है


    बहुत सशक्त सामयिक यथार्थ। एक दिन ये भी प्रधानमन्त्री बनेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  6. रोजी के लिए नौनिहाल माँजता बरतन
    हाथों में उसके आज भी झूठा गिलास है


    बहुत सशक्त सामयिक यथार्थ। एक दिन ये भी प्रधानमन्त्री बनेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  7. दिल्ली उन्हीं के वास्ते, दिल जिनके पास है
    खाली है अगर जेब तो, दिल्ली उदास है
    ...दिल्ली पैसे वालों की

    उत्तर देंहटाएं

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