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शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

"ग़ज़ल-रूप की बुनियाद" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लोग जब जुट जायेंगे, तो काफिला हो जायेगा
आम देगा तब मज़ा, जब पिलपिला हो जायेगा

पास में आकर कभी, कुछ वार्ता तो कीजिए
बात करने से रफू शिकवा-गिला हो जायेगा

आपसी पहचान से, रिश्ते नये बन जायेंगे
रोज़ मिलने का शुरू, जब सिलसिला हो जायेगा

नेह बाती को मिलेगा, जगमगायेगा दिया
जिस्म में जब आत्मा का, दाखिला हो जायेगा

“रूप” की बुनियाद पर तो, प्यार है टिकता नहीं
अच्छा-भला इन्सान इससे मुब्तिला हो जायेगा
(मुब्तिला=पीडित)

4 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी ग़ज़ल है विसंगतियो से हट कर -
    नेह बाती को मिलेगा, जगमगायेगा दिया
    जिस्म में जब आत्मा का, दाखिला हो जायेगा

    उत्तर देंहटाएं
  2. “रूप” की बुनियाद पर तो, प्यार है टिकता नहीं
    अच्छा-भला इन्सान इससे मुब्तिला हो जायेगा
    (मुब्तिला=पीडित)

    सशक्त अभिव्यक्ति की ग़ज़ल अर्थ अन्विति में समस्वरता लिए।

    उत्तर देंहटाएं

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