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बुधवार, 10 सितंबर 2014

"गीत-अब न कुठाराघात करो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सम्बन्धों की दुनियादारी,
अनुबन्धों की बात करो।
सपने कब अपने होते हैं,
सपनों की मत बात करो।।

लक्ष्य नहीं हो जिन राहों में,
कभी न उन पर कदम धरो,
जिनसे औंधे मुँह गिर जाओ,
ऐसी नहीं उड़ान भरो,
रंग-बिरंगी इस दुनिया में,
कभी नहीं उत्पात करो।
सपने कब अपने होते हैं,
सपनों की मत बात करो।।

अपनी बोली, अपनी भाषा,
सबको लगती है प्यारी,
उपवन को धनवान बनाती,
किसिम-किसिम की फुलवारी,
सबके अपने भिन्न वेश है,
ऐसा भारतवर्ष देश है। 
पाले की मारी बगिया में,
और न अब हिमपात करो।
सपने कब अपने होते हैं,
सपनों की मत बात करो।।

अन्न जहाँ का खाते हो,
जलपान जहाँ पर करते हो,
अपने काले कृत्यों से,
क्यों उसे कलंकित करते हो,
मानवता की प्राचीरों पर,
अब न कुठाराघात करो।
सपने कब अपने होते हैं,
सपनों की मत बात करो।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 11-9-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा -1733 में दिया गया है ।
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. ahhaa!!!
    kamal ka geet hai, " sapne kab apne hote hain......"
    rooh me utar gaya .

    उत्तर देंहटाएं
  3. सपने कब अपने होते हैं,
    सपनों की मत बात करो।। सुंदर अभिव्यक्ति! आदरणीय शास्त्री जी!
    धरती की गोद

    उत्तर देंहटाएं
  4. पाले की मारी बगिया में और ना हिमपात करो
    मानवता की प्राचीरों पर अब ना कुठराघात करो
    सपने कब अपने होते हैं सपनों की ना बात करो
    बहुत अर्थपूर्ण पंक्तियां.

    उत्तर देंहटाएं
  5. मानवता की प्राचीरों पर,
    अब न कुठाराघात करो।

    बहुत उम्दा :)
    नई सोच नया अंदाज

    रंगरूट

    उत्तर देंहटाएं

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