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मंगलवार, 24 नवंबर 2015

दोहे "घटते जंगल-खेत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

घटते जाते धरा से, बरगद-पीपल-नीम।
इसीलिए तो आ रहे, घर में रोज हकीम।।
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रक्षक पर्यावरण के, होते पौधे-पेड़।
लेकिन मानव ने दिये, जड़ से पेड़ उखेड़।।
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पेड़ काटता जा रहा, धरती का इंसान।
प्राणवायु कैसे मिले, सोच अरे नादान।।
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दौलत के मद में मनुज, करता तोड़-मरोड़।
हरितक्रान्ति  संसार में, आज रही दम तोड़।।
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कंकरीट को बो रहा, खेतों में इंसान।
कसरत करने के लिए, बचे नहीं मैदान।।
--
आबादी तो बढ़ रही, घटते जंगल-खेत।
पानी बिन सरिताओं में, उड़ता केवल रेत।।
--
दोहन हुआ पहाड़ का, गरज रहा भूचाल।
इंसानी करतूत से, जीवन है बेहाल।।

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