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मंगलवार, 3 नवंबर 2015

"जगत है जीवन-मरण का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
था कभी ये 'रूप' ऐसा।
हो गया है आज कैसा??
 
बालपन में खेल खेले।
दूर रहते थे झमेले।।

छा गई थी जब जवानी।
शक्ल लगती थी सुहानी।।
 
तब मिला इक मीत प्यारा।
दे रहा था जो सहारा।।

खुशनुमा उपवन हुआ था।
धन्य तब जीवन हुआ था।।
 
बढ़ी गई जब मोह-माया।
तब बुढ़ापे ने सताया।

जब हुई कमजोर काया।
मौत का आया बुलावा।।

चक्र है आवागमन का।
जगत है जीवन-मरण का।।

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