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बुधवार, 4 नवंबर 2015

"पुनः हरा नही हो सकता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पागल तो हो सकता हूँ
पर डरा हुआ नही हो सकता।
निद्रा में हो सकता हूँ
पर मरा हुआ नही हो सकता।।

जो परिवेशों में घटता है,
उसको ही मैं गाता हूँ।
गूँगे-बहरे से समाज को,
लिख-लिखकर समझाता हूँ।।
अच्छा तो हो सकता हूँ,
पर बहुत बुरा नही हो सकता।।

मैं दरख़्त का पीला पत्ता,
मद्धम सुर में गाता हूँ।
भोजन का अम्बार लगा है,
फिर भी मैं नही खाता हूँ।।
सूखा तो हो सकता हूँ,
पर पुनः हरा नही हो सकता।।

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