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रविवार, 29 नवंबर 2015

दोहे "मँहगाई के सामने, जनता है लाचार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उत्तर भारत को चुना, कुहरे ने आवास।
सरदी का होने लगा, लोगों को आभास।।
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ऊनी कपड़ों का सजा, फिर से अब बाजार।
आमआदमी पर पड़ी, मँहगाई की मार।।
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सरेआम होने लगी, जमकर लूट-खसोट।
अब काजू-बादाम से, मँहगे हैं अखरोट।।
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ग़ज़क-रेवड़ी कह रहे, गुड़ के ऊँचे भाव।
तेल और घी के बिना, बनता नहीं पुलाव।।
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खिचड़ी अब कैसे पके, मँहगी काली दाल।
अरहर-मूँग-मसूर का, रूप हुआ विकराल।।
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मँहगाई तो देश में, मचा रही कुहराम।
गाजर-आलू-मटर के, बढ़े हुए हैं दाम।।
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मत पा करके हो गयी, अभिमानी सरकार।
मँहगाई के सामने, जनता है लाचार।। 

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