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गुरुवार, 5 नवंबर 2015

गीत "एकता की धुन बजायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

एक दीपक तुम जलाओ, एक दीपक हम जलायें।
आओ मिलकर हम धरा को, रौशनी से जगमगायें।।

आज दूषित सभ्यता की, चल रहीं हैं आँधियाँ,
आग में अलगाव की तो, जल रही हैं वादियाँ,
नफरतों को दूर करके, एकता की धुन बजायें।
आओ मिलकर हम धरा को, रौशनी से जगमगायें।।

वतन में गन्दी सियासत, सेंकती हैं रोटियाँ,
स्वप्न ज़न्नत के दिखाकर, नोचती हैं बोटियाँ,
सूखते परिवेश में हम, नेह की फसलें उगायें।
आओ मिलकर हम धरा को, रौशनी से जगमगायें।।

अन्न-जल खाकर वतन में, हम पले हैं,
थामकर अँगुली वतन की हम चले हैं,
आओ श्रद्धा-भाव से उस मातृभू को सिर नवायें।
आओ मिलकर हम धरा को, रौशनी से जगमगायें।।

जगत में अस्तित्व है जिससे हमारा,
सभी का होता यहाँ पर है गुजारा,
शौर्य के, अभिमान के हम गीत आओ गुनगुनायें।
आओ मिलकर हम धरा को, रौशनी से जगमगायें।।

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