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सोमवार, 30 नवंबर 2015

दोहे "वाणी का संधान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उनसे कैसी मित्रता, जो करते हैं घात।
ऐसे लोगों से बचो, करते जो उत्पात।।
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करता मुख के सामने, मीठी-मीठी बात।
होता नहीं कुतर्क से, कोई भी विख्यात।।
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मनवाना जो चाहता, अपनी बात बलात।
वो दुर्जन करता सदा, सज्जन पर आघात।।
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दुष्ट नहीं माने कभी, धर्म-कर्म-उपदेश।
उलटे लगते हैं उसे, उपयोगी सन्देश।।
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बिना विचारे जो करे, वाणी का संधान।
वो मानव के रूप में, साक्षात् हैवान।।

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