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मंगलवार, 19 जनवरी 2016

गीत "कुहासे का आवरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कुहासे का आवरण, आकाश पर चढ़ने लगा।।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।

हाथ ठिठुरे-पाँव ठिठुरे, काँपता आँगन-सदन,
कोट,चस्टर और कम्बल से ढके सबके बदन,
आग का गोला शरद में पस्त सा  पड़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।

सर्द मौसम को समेटे, जागता परिवेश है, 
श्वेत चादर को लपेटे, झाँकता रजनीश है,
गगन के नयनों से शीतल अश्रुजल झड़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।

आगमन ऋतुराज का लगता बहुत ही दूर है,
अभी तो हेमन्त यौवन से बहुत भरपूर है,
मकर का सूरज नये सन्देश को गढ़ने लगा। 
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।

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