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सोमवार, 25 जनवरी 2016

"लोक का नहीं रहा जनतन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अंग्रेजी से ओत-प्रोत,
अपने भारत का तन्त्र,
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

आजादी के बाद हमारी,
मौन हो गई भाषा,
देवनागरी के सपनों की,
क्षीण हो गई आशा,
अभिलुप्त हो गये छंद-शास्त्र,
सब सुप्त हो गये मन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

कहाँ गया गौरव-अतीत,
रीती अमृत की गागर,
उर में बसी प्रीत का अब तो,
सूख रहा है सागर,
किसने इस आजाद चमन में
बोया है षडयन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

कभी थे जो जग में वाचाल,
हो गये गूँगे माँ के लाल,
विदेशों में जाकर अधिराज,
हुए क्यों भाषा से कंगाल,
कर रहे अस्मत को नीलाम,
लोक का नहीं रहा जनतन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

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