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सोमवार, 18 जनवरी 2016

गीत "सूरज नभ में शर्माया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सन-सन शीतल चली पवन,
सर्दी ने रंग जमाया है।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शर्माया है।।
जलते कहीं अलाव, सेंकता बदन कहीं है कालू,

कोई भूनता शकरकन्द को, कोई भूनता आलू,
दादा जी ने अपने तन  पर,
मोटा कम्बल लिपटाया है।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शर्माया है।।
जितने वस्त्र लपेटो, उतना ही ठण्डा लगता है,
चन्दा की क्या कहें, सूर्य भी शीत उगलता है,
धूप गुनगुनी पाने को,
सबका मन ललचाया है।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शर्माया है।।
काजू और बादाम स्वप्न जैसे लगते निर्धन को,
मूँगफली खाकर देते हैं सभी दिलासा मन को,
गजक-रेवड़ी के दर्शन कर,
दिल को समझाया है।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शर्माया है।।

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