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शनिवार, 30 जनवरी 2016

दोहे "माँ का हृदय उदार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छन्दों में देना मुझे, शब्दों का उपहार।
माता मेरी वन्दना, कर लेना स्वीकार।।
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गति, यति, सुर, लय-ताल का, नहीं मुझे कुछ ज्ञान।
बिना पंख के उड़ रहा, मन का रोज विमान।।
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मिला नहीं अब तक मुझे, कोई भी ईनाम।
तुकबन्दी मैं कर रहा, माता का ले नाम।।
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आड़ी-तिरछी खींचता, रेखाओं को रोज।
रूप-रंग से हीन है, मानस कुमुद-सरोज।।
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होता है सुत के लिए, माँ का हृदय उदार।
नाम आपका शारदे, कविता में दो सार।।
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माता अपने दास पर, करना यह उपकार।
जीवनभर सुनता रहूँ, वीणा की झंकार।।
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अक्षर-शब्द विधान में, माताजी का नाम।
नित्य-नियम से आपकी, पूजा करना काम।।
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नहीं जानता साधना, रहता हरदम मौन।
देकर कर में तूलिका, लिखवा जाता कौन।।
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शब्दों के संयोग से, बन जाता साहित्य।
माता के आशीष से, आ जाता लालित्य।।

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