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शनिवार, 5 मार्च 2016

दोहे "मेरे पौत्र प्रांजल का 17वाँ जन्मदिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मना रहे थे जब सभी, होली का त्यौहार।
पौत्ररत्न के रूप में, तब पाया उपहार।।
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आज 17वाँ जन्मदिन, मना रहा परिवार।
इस अवसर पर सब तुम्हें, देंगे कुछ उपहार।।
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नाम तुम्हारा प्रांजल, रक्खा ललित-ललाम।
करना देश-विदेश में, अपने कुल का नाम।।
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जन्मदिवस पर है यही, मेरा शुभ-आशीष।
पढ़लिखकर बन जाओ तुम, जल्दी से वागीश।।
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बचपन में उँगली पकड़, पोता चलता साथ।
किन्तु बुढ़ापे में सदा, पौत्र थामता हाथ।।
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साहुकार को मूल से, प्यारा लगता सूद।।
जुड़ जाता जब ब्याज तो, धन का बढ़े वजूद।।
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अपने कुल-परिवार की, बेटा तुम हो ढाल।
पाकर तुमको हो गया, अब मैं मालामाल।।
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नहीं कभी भी आयगा, जीवन में उलझाव।
लेकिन रखना तुम सदा, अपना सरल सुभाव।।

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