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शुक्रवार, 4 मार्च 2016

गीत "रचना में दुहराता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रोज़-रोज़ मैं शब्दों का गठबन्धन करता जाता हूँ।  
जो दिनभर में देखा, उसको रचना में दुहराता हूँ।।
नया साल या प्रेमदिवस हो या हो होली-दीवाली,
रक्षाबन्धन जन्मदिवस या हो खेतों की हरियाली, 
ग्रीष्म-शीत और वर्षा पर तुकबन्दी कर हर्षाता हूँ।
जो दिनभर में देखा, उसको रचना में दुहराता हूँ।।

महादेव का वन्दन हो या हो माता का आराधन,
कोमल बच्चे याद दिला जाते मुझको मेरा बचपन,
बालगीत नित नये बनाकर उनको रोज सुनाता हूँ।
जो दिनभर में देखा, उसको रचना में दुहराता हूँ।।

दीन-दुखी. बूढ़े वरगद का होता है अपमान जहाँ,
खूनसनी स्याही से लिखती, अक्षर मेरी कलम वहाँ,
अबलाओं की व्यथा देख, खामोश नहीं रह पाता हूँ।
जो दिनभर में देखा, उसको रचना में दुहराता हूँ।।

जँगली जीवों और वनों नहीं दुःख देखा जाता,
सरिताओं में बढ़े प्रदूषण से मेरा मन अकुलाता,
मानवता को चीख-चीखकर, मैं दिन-रात जगाता हूँ। 
जो दिनभर में देखा, उसको रचना में दुहराता हूँ।।

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