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मंगलवार, 8 मार्च 2016

"शिवरात्रि की रात में सात बार रंग बदलता है पत्थर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

            बरेली-पिथौरागढ़ राष़्टीय राजमार्ग पर खटीमा से 7 किमी दूर श्री वनखण्डी महादेव के नाम से विख्यात एक प्राचीन शिव मन्दिर है! यह दिल्ली से 300 किमी और बरेली से 100 किमी दूर है कभी यह स्थान घने जंगलों के मध्य में हुआ करता था परन्तु अब यह चकरपुर गाँव से बिल्कुल सटा हुआ है। इसके साथ ही बरेली-पिथौरागढ़ राष़्टीय राजमार्ग है।
वनखण्डी महादेव समिति, चकरपुर ने अब यहाँ सुन्दर तोरण-द्वार बना दिया है।
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समिति ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करके इसे सजाया और सँवारा भी है।
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 मन्दिर के भीतर का दृश्य देखकर तो आपको आश्चर्य होगा कि यहाँ कोई शिवलिंग नही है अपितु कलश के ठीक नीचे एक साधारण सा दिखाई देने वाला पत्थर है। अवधारणा है कि शिवरात्रि को यह पत्थर सात बार रंग बदलता है।
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चकरपुर स्थित ऐतिहासिक बनखंडी महादेव शिवमंदिर का शिवलिंग महाशिवरात्रि पर्व पर सात रंग बदलता है। इसके दर्शन से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इसी आस्था व विश्वास के चलते ही शिवरात्रि पर मंदिर में मत्था टेकने वालों भक्तों का सैलाब उमड़ता है। आसपास क्षेत्रों के साथ ही पड़ोसी देश नेपाल के लोग भी जलाभिषेक करने यहां पहुंचते है।
मन्दिर के मुख्य-महन्त ने इससे जुड़ी कहानी सुनाते हुए कहा-
     “प्रणवीर महाराणा प्रताप के वीरगति को प्राप्त होने के उपरान्त कुछ राजपूत महिलाएँ तो सती हो गईं थी, लेकिन कुछ राजकुमारियों ने अपने सेवकों के साथ मेवाड़ से पलायन कर खटीमा के समीप नेपाल की तराई के जंगलों में अपना ठिकाना बना लिया था। यह कबीला “थारू” जनजाति के नाम से जाना जाता है।
      उसी समय की बात है कि एक थारू की गाय घर में बिल्कुल दूध नही देती थी। लोगों ने जब इसका कारण खोजा तो पता लगा कि यह गाय प्रतिदिन जंगल में जाकर एक पत्थर के पास जाती है और अपने थनों से दूध गिरा कर आ जाती है।”
थारू समाज के लोगों ने यहाँ एक साधारण सा शिवालय बना दिया।
       मन्दिर में कलश के नीचे वही पत्थर है जिस पर गाय अपने थनों से दूध गिरा कर इसको प्रतिदिन स्नान कराती थी।
       प्रत्येक वर्ष यहाँ शिवरात्रि को एक विशाल मेला लगता है। जो सात दिनों तक चलता है।
कभी आपका भी इधर आना हो तो “वनखण्डी-महादेव” के इस प्राचीन शिव-मन्दिर का दर्शन करना न भूलें!
आज महाशिवरात्रि है। 
              प्रातःकाल तो यहाँ दर्शनार्थी भक्तों की बहुत लम्बी कतारें होती हैं। इसलिए हम लोग शाम को 5 बजे दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए यहाँ पर आये। 


कहा जाता है कि इस मन्दिर में स्थापित
यह मामूली सा दिखने वाला पत्थर
शिवरात्रि की रात में सात बार रंग बदलता है।
इसके प्रांगण में यह विशाल यज्ञकुण्ड स्थापित है।
यह मन्दिर में जाने का मुख्य द्वार है!

इसके बाहर के प्रांगण में 
यह विशालकाय पीपल का वृक्ष है!

यह मन्दिर का मेनगेट है।
मेले में अभी भी बहुत चहल-पहल है!
श्रीमती जी पीपल के वृक्ष के नीचे 
धूप लगाने की तैयारी कर रही हैं।


मन्दिर में छोटा पुत्र, पुत्रवधु और श्रीमती जी।

तभी आकाश में हवाई जहाज का भी 
धुआँ नजर आ गया!

मेले में तो भगवान भी बिक रहे हैं।
यहाँ 5 दिनों तक लगने वाले मेले में
सभी दुकानें सजी-धजी हैं।

आँखों की सुरक्षा के लिए चश्में भी तो हैं।
चमचे न हों तो मज़ा ही क्या है?
मन्दिर के बाहर बाबा जी कितने रसविभोर होकर
शिव के भजन गा रहे हैं।

कुछ और भी चित्र नीचे हैं-

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