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शनिवार, 12 मार्च 2016

मेरे दो मुक्तक "समय का चक्र चलता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कहीं चन्दा चमकता है, कहीं सूरज निकलता है,
नहीं रुकता, नहीं थकता, समय का चक्र चलता है।
लड़ा तूफान से जो भी, सिकन्दर बन गया वो ही,
उजाले के लिए रातों में, नन्हा दीप जलता है।।
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सम्भल कर पग बढ़ा आगे, बड़ी संगीन राहे हैं,
समन्दर की लहर में भी छिपीं, गमगीन आहे हैं।
मुसाफिर खो नहीं जाना, कहीं पुरनूर गलियों में,
पनपती हैं सभी के दिल में, तो रंगीन चाहे हैं।।

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