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सोमवार, 28 मार्च 2016

ग़ज़ल "माँग छोटे आशियानों की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

काव्यसंकलन
शामियाना-3
में मेरी ग़ज़ल
 
माँग छोटे आशियानों की
दरक़ती जा रही हैं नींवअब पुख़्ता ठिकानों की
तभी तो बढ़ गयी है माँग छोटे आशियानों की

जिन्हें वो देखते कलतकहिक़ारत की नज़र से थे
उन्हीं के शीश पर छतछा रहे हैं शामियानों की

बहुत अभिमान था उनकोकबीलों की विरासत पर
हुई हालत बहुत खस्ताघमण्डी खानदानों की

सियासत के समर में मिट गयाअभिमान दल-बल का
अखाड़े में धुलाई हो गयीजब पहलवानों की

लगा झटका-बढ़ा खटकाखनककर आइना चटका
बग़ावत कर रहीं अब पगड़ियाँदस्तारखानों की

जगा है आम जब सेखास को होने लगी चिन्ता
अचानक आ गयी है यादमज़लूमों-किसानों की

सलाखों का समाया डरलगे अब काँपने थर-थर,
उज़ाग़र ख़ामियाँ जब हो गयींइन बे-ईमानों की

विदेशी बैंक में जाकरछिपाया देश के धन को
खुलेगी पोल-पट्टी अबशरीफों के घरानों की

सियासी गिरगिटों के रूप” कीपहचान करने को
निकल आयीं सड़क पर टोलियाँअब नौजवानों की

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